नयी दिल्ली, 26 मई (वार्ता) भारत एंटी-डंपिंग शुल्क लगाकर हर साल करीब 28,540 करोड़ रुपये के बराबर विदेशी मुद्रा बचा सकता है। सेंटर फॉर डोमेस्टिक इकोनॉमी पॉलिसी रिसर्च (सी-डीईपी) और केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के सेंटर फॉर डब्ल्यूटीओ स्टडीज की मंगलवार को जारी एक साझा रिपोर्ट में यह बात कही गयी है। इसमें दावा किया गया है कि ऐसा करने से घरेलू उद्योगों में 70,000 करोड़ रुपये तक अतिरिक्त निवेश का रास्ता खुल सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, लंबे समय तक सस्ते आयात से घरेलू उद्योगों और छोटे एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) पर दबाव बढ़ा है। यदि समय रहते एंटी-डंपिंग उपाय लागू किये जाते हैं तो घरेलू उत्पादन क्षमता मजबूत होगी और स्थानीय उद्योगों को सहारा मिल सकता है। एंटी-डंपिंग ड्यूटी उन मामलों में लगायी जाती है, जब विदेशी कंपनियां किसी उत्पाद को अपने घरेलू बाजार की तुलना में कम कीमत पर दूसरे देशों में बेचती हैं। सरकार इसका इस्तेमाल घरेलू उद्योगों को अनुचित प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए करती है।
हाल के वर्षों में कुछ खास अवधियों के दौरान एंटी-डंपिंग शुल्क लागू नहीं होने और चीन से आयात में वृद्धि पर रिपोर्ट में चिंता व्यक्त की गयी है। इसमें कहा गया है कि घरेलू उत्पादन क्षमता मौजूद होने के बावजूद बढ़ते आयात से विदेशी मुद्रा और उद्योगों की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा पर दबाव पड़ सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत एंटी-डंपिंग शुल्क के इस्तेमाल में कई बड़े देशों की तुलना में अपेक्षाकृत संतुलित रुख अपनाता रहा है। इसके मुताबिक, भारत में ऐसे शुल्क की औसत अवधि 6.97 साल है, जबकि वैश्विक औसत 11.19 वर्ष का है।

