नयी दिल्ली, 25 मई (वार्ता) केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने अफ्रीका के कुछ हिस्सों में हाल ही में सामने आए इबोला विषाणु संक्रमण के प्रकोप के मद्देनजर देश में इससे निपटने और एहतियाती उपायों की यहां सोमवार को समीक्षा की ।
भारत में इबोला संक्रमण का अभी तक मामला सामने नहीं आया है। समीक्षा बैठक में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव, आईसीएमआर के महानिदेशक, स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक (डीजीएचएस), अतिरिक्त सचिव (सार्वजनिक स्वास्थ्य), निदेशक, एनसीडीसी और मंत्रालय के अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।इस बैठक में केंद्र सरकार ने अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर आवश्यक प्रतिक्रिया उपायों को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया है और सीमावर्ती क्षेत्रों में विशेष चौकसी बरतने के निर्देश दिये गये है।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने परामर्श में कहा है कि कांगो, युगांडा और दक्षिण सूडान में बदलती स्थिति और विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिशों को देखते हुए, सभी भारतीय नागरिकों को अगली सूचना तक इन देशों की अनावश्यक यात्रा से बचने की सलाह दी जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस प्रकोप को अंतर्राष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल (पीएचईआईसी) घोषित किया है और अफ्रीका रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (अफ्रीका सीडीसी) ने इसे महाद्वीपीय सुरक्षा का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल (पीएचईसीएस) घोषित किया है।
गौरतलब है कि कांगो में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की निगरानी बढ़ाने के बाद इस देश में अब तक इबोला के 900 से अधिक संदिग्ध मामलों की पहचान की गयी है।
इस प्रकोप का मुख्य केंद्र इटुरी प्रांत है, जहां पहले से ही करीब 50 लाख लोग लगातार जारी हिंसक संघर्ष में फंसे हुए हैं। इस वजह से शुरुआती दौर में मामले की पहचान करना मुश्किल हो गया है और संकट गहरा गया है।
डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी साझा करते हुए लिखा, “एक्टिव केस-खोज अभियानों के कारण कांगों में इबोला के कुल 904 संदिग्ध मामले सामने आये हैं। इनमें प्रयोगशाला की ओर से पुष्ट किये गये 101 संक्रमण के मामले भी शामिल हैं।” डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने इस बात पर जोर दिया कि इस प्रकोप का मुख्य केंद्र इटुरी प्रांत है, जहां पहले से ही करीब 50 लाख लोग लगातार जारी हिंसक संघर्ष में फंसे हैं। उन्होंने कहा कि इस कारण महत्वपूर्ण स्वास्थ्य और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं सहित हजारों लोगों को पलायन करना पड़ा है।
श्री टेड्रोस के अनुसार, मौजूदा असुरक्षा और डर की वजह से प्रभावित समुदायों में गहरा अविश्वास पैदा हो गया है। इस माहौल ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रयासों को गंभीर रूप से बाधित किया है। इससे संक्रमितों के संपर्क में आये लोगों का पता लगाने और शुरुआती दौर में संक्रमण की पहचान का काम बेहद मुश्किल हो गया है।
कांगो के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि तीन प्रभावित प्रांतों में इस घातक वायरस के कारण 204 लोगों की मौत हो चुकी है। डब्ल्यूएचओ ने 16 मई को बुंडिबुग्यो इबोला वायरस स्ट्रेन के कारण फैले इस प्रकोप को ‘अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल’ (पीएचईआईसी) घोषित किया था।
इबोला एक अत्यंत घातक और संक्रामक वायरल बीमारी है, जिसके कारण गंभीर रक्तस्राव (हेमोरेजिक बुखार) और अंगों का खराब होना होता है। यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के शारीरिक तरल पदार्थों (खून, लार, पसीना आदि) के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। अभी तक इसका कोई टीका या दवा नहीं है जिसकी वजह से यह जानलेवा साबित हो रहा है।
