अबू धाबी | पश्चिम एशिया में जारी भारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से एक बेहद चौंकाने वाली और डराने वाली खबर सामने आई है। रविवार को यूएई के अल-जफरा क्षेत्र में स्थित ‘बराक न्यूक्लियर एनर्जी प्लांट’ को निशाना बनाकर कई आत्मघाती ड्रोन हमले किए गए, जिससे परमाणु संयंत्र के कॉम्प्लेक्स के भीतर रखे एक विशाल इलेक्ट्रिकल जनरेटर में भीषण आग लग गई। इस अचानक हुए हवाई हमले के बाद संवेदनशील ऊर्जा केंद्र में मची अफरा-तफरी को नियंत्रित करने के लिए तुरंत आपातकालीन (इमर्जेंसी) टीमों को काम पर लगाया गया। अबू धाबी मीडिया ऑफिस ने डिजिटल प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर कूटनीतिक रूप से इस घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि राहत दलों ने आग पर पूरी तरह काबू पा लिया है। प्रशासन ने दुनिया को आश्वस्त किया है कि इस हादसे में कोई हताहत नहीं हुआ है और संयंत्र के रेडियोलॉजिकल सुरक्षा स्तर (रेडिएशन लेवल) पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है।
इस गंभीर हमले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा चिंताओं को अत्यधिक बढ़ा दिया है, क्योंकि ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच जारी कूटनीतिक गतिरोध के दौरान यह पहली बार है जब चार रिएक्टर वाले इस रणनीतिक परमाणु संयंत्र को सीधे निशाना बनाया गया है। भौगोलिक दृष्टि से यह पावर प्लांट अबू धाबी से दूर पश्चिमी रेगिस्तान में सऊदी अरब की सीमा के अत्यंत निकट स्थित है, जो पूरे अरब प्रायद्वीप में एकमात्र परिचालन परमाणु ऊर्जा सुविधा है। उल्लेखनीय है कि यूएई ने दक्षिण कोरिया के तकनीकी सहयोग से लगभग 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर के भारी-भरकम निवेश के साथ बराक न्यूक्लियर पावर प्लांट का निर्माण किया था, जिसका संचालन वर्ष 2020 में सफलतापूर्वक शुरू हुआ था। फिलहाल, वियना स्थित अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने सुरक्षा नियमों के इस गंभीर उल्लंघन पर तुरंत कोई कूटनीतिक टिप्पणी नहीं की है और न ही अभी तक किसी चरमपंथी समूह ने इस हमले की आधिकारिक जिम्मेदारी ली है।
रणनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, बराक पावर प्लांट पर हुआ यह हमला कोई एकल घटना नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र में पिछले कई हफ्तों से होर्मुज जलडमरूमध्य (हॉरमुज स्ट्रेट) और फारस की खाड़ी के आसपास चल रहे खतरनाक सैन्य संघर्ष का हिस्सा है। वर्तमान में ईरान और अमेरिका के बीच बैक-चैनल कूटनीतिक बातचीत पूरी तरह से ठप हो चुकी है, जिसके कारण खाड़ी देशों में एक नाज़ुक युद्धविराम के पूरी तरह टूटने का वास्तविक खतरा पैदा हो गया है। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस संवेदनशील परमाणु प्रतिष्ठान पर दोबारा हमला होता है या जवाबी कूटनीतिक कार्रवाई की जाती है, तो पूरा पश्चिम एशिया एक विनाशकारी महायुद्ध की आग में झुलस सकता है, जिसका सीधा असर कच्चे तेल की वैश्विक आपूर्ति पर पड़ेगा और दुनिया भर में एक अभूतपूर्व ऊर्जा संकट गहरा जाएगा।

