
प्रवेश कुमार मिश्र नई दिल्ली। केरल विजय के दस दिनों बाद तमाम अटकलों के बीच मुख्यमंत्री के रूप में वीडी सतीशन के नाम का फैसला केवल एक मुख्यमंत्री का चयन नहीं, बल्कि एक नई, व्यवहारिक और आक्रामक कांग्रेस के पुनर्जन्म का ब्लूप्रिंट है. संभवतः इसीलिए यह कहा जा रहा है कि कांग्रेस अब क्षेत्रीय क्षत्रपों के हवाई दावों को दरकिनार कर परामर्श आधारित लोकतांत्रिक प्रक्रिया तथा जमीनी हकीकत को स्वीकार करते हुए पीढ़ीगत बदलाव की नई रणनीति पर चल पड़ी है.
राजनीतिक जानकार बता रहे हैं कि उक्त निर्णय कांग्रेस की पुरानी कार्यशैली से बिल्कुल अलग है. अतीत में कांग्रेस अक्सर दिल्ली में बैठे अपने करीबियों या क्षत्रपों के दबाव के आगे घुटने टेक देती थी, जिसका खामियाजा उसे निरंतर भुगतना पड़ा है. लेकिन केरल के मामले में राहुल गांधी ने सख्त रुख अपनाते हुए कार्यकर्ताओं की सड़कों पर गुटबाजी को खारिज किया और स्पष्ट किया कि नेतृत्व बैकपैक फैसलों से नहीं, बल्कि जमीन पर किए गए संघर्ष से तय होगा. क्योंकि सतीशन 2001 से लगातार विधानसभा सदस्य रहते हुए 2021 से विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में एलडीएफ सरकार के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए थे, उन्हें कमान सौंपना यह दिखाता है कि पार्टी अब “पैराशूट लीडर्स” के बजाय जमीनी जवाबदेही को तवज्जो दे रही है.
जानकार बता रहे हैं कि इस निर्णय के माध्यम से कांग्रेस हाईकमान ने देश की राजनीति और अपने संगठन को तीन बड़े संदेश दिए हैं जिसके तहत गुटबाजी पर कड़ा प्रहार, पीढ़ीगत बदलाव तथा गठबंधन सहयोगियों पर भरोसा व्यक्त करना शामिल है.
निजी पसंद से ऊपर पार्टी हित
राजनीति के जानकारों के मुताबिक केरल में सतीशन को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला राहुल गांधी की राजनीतिक परिपक्वता, उनकी कार्यशैली में आए बड़े बदलाव और भविष्य की व्यवहारिक राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण है यानी इसे एक मास्टरस्ट्रोक के रूप में देखा जा रहा है. क्योंकि इस रेस में राहुल गांधी के सबसे वफादार और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे थे. राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि वेणुगोपाल आलाकमान की निजी पसंद थे और उनके पक्ष में अपेक्षाकृत अच्छी संख्या में विधायक भी थे. लेकिन राहुल गांधी ने अपने किसी ‘खास’ नेता को थोपने के बजाय जमीनी स्तर पर विधायकों, कार्यकर्ताओं और जनता की पसंद रहे सतीशन को तरजीह दी.ऐसा करके उन्होंने संदेश दिया कि पार्टी हित उनकी निजी पसंद से ऊपर है. इतना ही नहीं राहुल ने एक झटके में ‘पर्ची’ और ‘हाईकमान’ संस्कृति का अंत करते हुए नेता थोपने का चलन समाप्त किया. इस बड़े कदम से राहुल गांधी ने न केवल केरल में बल्कि देश के अन्य राज्यों के नेताओं को भी यह कड़ा और स्पष्ट संदेश दे दिया है कि अब कांग्रेस में पद गणेश परिक्रमा के बजाय केवल जमीनी संघर्ष और जनसमर्थन के आधार पर मिलेगा. इतना ही नहीं राहुल गांधी ने केरल कांग्रेस में दशकों तक ओमन चांडी और के. करुणाकरण जैसे दिग्गजों के गुटों के बाद बन रहे नए गुटों को समाप्त कर सतीशन की ताजपोशी के साथ पुरानी गुटीय जकड़न को तोड़कर नए युग के नेतृत्व को आगे बढ़ाया है.
जानकार बता रहे हैं कि राहुल गांधी ने केरल, कर्नाटक, तेलंगाना में अपनी मजबूत सरकार के अलावा तमिलनाडु में नवउदित पार्टी के मुखिया सी जोसेफ विजय को समर्थन देते हुए मुख्यमंत्री बनाने में मदद कर 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए दक्षिण भारत का एक बेहद स्थिर और मजबूत किला तैयार कर भविष्य के लिए एक मजबूत लकीर खींच दी है.
गुप्त फीडबैक को महत्ता
बहरहाल, केरल को नए नेतृत्व देने के पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे व राहुल गांधी ने जिस तरह से दो केन्द्रीय पर्यवेक्षकों, नौ पूर्व प्रदेश अध्यक्षों, सभी नवनिर्वाचित विधायकों तथा सभी जिलाध्यक्षों से गुप्त फीडबैक मंगाकर बहुस्तरीय विमर्श के बाद निर्णय किया है उससे साफ है कि कांग्रेस बहुस्तरीय बदलाव की ओर बढ़ चली है.
