वाशिंगटन | अमेरिकी प्रशासन को व्यापारिक मोर्चे पर उस समय भारी पराजय का सामना करना पड़ा, जब एक संघीय अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए 10 प्रतिशत वैश्विक शुल्क को पूरी तरह ‘अवैध’ करार दिया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यह शुल्क कानून द्वारा अनधिकृत है और राष्ट्रपति ने उन शक्तियों का अतिक्रमण किया है जो संसद ने उन्हें सीमित उद्देश्यों के लिए दी थीं। यह आदेश भारत सहित उन सभी देशों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, जिन पर 24 फरवरी को प्रशासन ने 150 दिनों के लिए ये नए शुल्क थोप दिए थे।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार न्यायालय ने बहुमत से दिए अपने फैसले में कहा कि ट्रंप प्रशासन ने 1974 के व्यापार अधिनियम के जिन प्रावधानों का सहारा लिया था, वे केवल ‘भुगतान संतुलन संकट’ की स्थिति में ही लागू हो सकते हैं। न्यायाधीशों ने तर्क दिया कि यदि राष्ट्रपति को उप-खातों के आधार पर घाटा दिखाकर शुल्क लगाने की असीमित शक्ति दे दी गई, तो यह संसद के अधिकारों का हनन होगा। अदालत ने चेतावनी दी कि कानून की इतनी व्यापक और मनमानी व्याख्या को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह राष्ट्रपति को आयात शुल्क लगाने की बेलगाम शक्ति प्रदान कर देगी।
इस अदालती फैसले के बाद अब भारत और अमेरिका के बीच होने वाले अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर फिर से बातचीत होने की संभावना है। हालांकि, यह फैसला फिलहाल तीन प्रमुख याचिकाकर्ताओं पर ही सीधे लागू होता है, लेकिन इसके कानूनी निहितार्थ व्यापक हैं। अमेरिकी प्रशासन द्वारा इस निर्णय के खिलाफ उच्च अदालत में अपील करने की पूरी संभावना जताई जा रही है। तब तक के लिए, अदालत के इस रुख ने वैश्विक व्यापारिक समुदायों को ट्रंप प्रशासन की आक्रामक शुल्क नीतियों के खिलाफ एक मजबूत कानूनी आधार प्रदान कर दिया है।

