नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति से जुड़े 2023 के नए कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान तल्ख टिप्पणी की है। जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने कहा कि अनूप बरनवाल मामले के निर्देश तक संसद द्वारा इस संबंध में कानून न बनाना ‘चुने हुए लोगों की तानाशाही’ जैसा था। बेंच ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि वह चाहती है कि जजों की नियुक्ति भी उसी गति से हो, जिस तेजी से चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियां की गई हैं। अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि सत्ता में आने के बाद दल स्वतंत्र संस्थाओं की स्वायत्तता की परवाह करना छोड़ देते हैं।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया और प्रशांत भूषण ने दलील दी कि 2024 में ज्ञानेश कुमार और सुखबीर संधू की नियुक्ति में प्रभावी परामर्श की कमी थी। बेंच को बताया गया कि 14 मार्च को ही सर्च कमेटी ने नाम भेजे, उसी दिन सिलेक्शन कमेटी की बैठक हुई और राष्ट्रपति ने नियुक्तियों पर मुहर लगा दी। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि सिलेक्शन कमेटी की बैठक जानबूझकर समय से पहले बुलाई गई ताकि सुप्रीम कोर्ट में दायर रिव्यू अर्जी पर सुनवाई से पहले प्रक्रिया पूरी की जा सके। वकील प्रशांत भूषण ने इसे ‘बहुमत का जुल्म’ करार देते हुए कहा कि सत्ता में आने वाला हर दल इस शक्ति का दुरुपयोग करना चाहता है।
जस्टिस दत्ता ने सुनवाई के दौरान कहा कि देश के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो भी सत्ता में आता है, वह एक जैसा ही व्यवहार करता है। उन्होंने संविधान पीठ के 2 मार्च 2023 के फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और सीजेआई (CJI) की सदस्यता वाली तीन सदस्यीय कमेटी का सुझाव दिया गया था। हालांकि, नए कानून में सीजेआई की जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया है, जिस पर विवाद जारी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान और मौलिक अधिकार इसीलिए हैं ताकि बहुमत के आधार पर मनमानी न की जा सके। मामले की अगली सुनवाई में सरकार को इन गंभीर सवालों के जवाब देने होंगे।

