चेन्नई, 01 मई (वार्ता) मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने एक मुस्लिम बालिका के कल्याण को सर्वोपरि मानते हुए एक हिंदू दंपति को उसका कानूनी अभिभावक नियुक्त किया है।
न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश और न्यायमूर्ति के. के. राधाकृष्णन की खंडपीठ ने मदुरै की एक पारिवारिक अदालत के उस आदेश के खिलाफ दायर दीवानी अपील पर यह फैसला सुनाया, जिसमें हिंदू दंपति को कानूनी अभिभावक नियुक्त करने की याचिका खारिज कर दी गई थी।
खंडपीठ ने इस तथ्य पर गौर किया कि बालिका जन्म के समय से ही (लगभग तीन वर्षों से) इस हिंदू दंपति की देखरेख में है और वह उन्हें ही अपने माता-पिता के रूप में पहचानती है।
निसंतान दंपति ने बालिका को जन्म (2023) के कुछ समय बाद ही गोद ले लिया था। दंपति बालिका की मां को पिछले 10 वर्षों से जानते थे। पति को खोने के बाद बालिका की मां अपनी दो संतानों के साथ इस बालिका का पालन-पोषण करने में दिक्कतों का सामना कर रही थी। ऐसे में उन्होंने दंपति को अपनी बच्ची को गोद देने का प्रस्ताव दिया था।
गोद लेने की प्रक्रिया को कानूनी रूप देने के लिए पारिवारिक अदालत में एक याचिका दायर की गई थी। पारिवारिक अदालत ने यह तो माना था कि एक गैर-मुस्लिम को भी अभिभावक नियुक्त किया जा सकता है, लेकिन इस आधार पर याचिका खारिज कर दी थी कि शिशु एक लड़की है और उसे गोद लेने वाला दंपति उसके लिए ‘अजनबी’ है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने बच्ची के कल्याण को ध्यान में रखते हुए कहा कि ‘गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890’ धर्म-निरपेक्ष है और यह हर उस व्यक्ति पर लागू होता है जो किसी नाबालिग का कानूनी अभिभावक नियुक्त होने का इच्छुक है।
पीठ ने यह भी कहा कि अधिनियम की धारा 17 के अनुसार याचिका पर विचार करते समय धर्म केवल एक विचारणीय पहलू होता है। अदालत के विचार में, अपीलकर्ता का कानूनी अभिभावक नियुक्त होने का अधिकार अधिनियम द्वारा मान्यता प्राप्त है।
बच्ची के हितों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने हिंदू दंपति की साख और उसकी जैविक मां की सहमति से संतुष्ट होकर उन्हें कानूनी अभिभावक नियुक्त कर दिया। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि बालिका अपीलकर्ता और उनकी पत्नी को ही अपने माता-पिता के रूप में पहचानती है क्योंकि उन्होंने जन्म से ही उसकी देखभाल की है।
