औद्योगिक क्षेत्र पर पश्चिम एशिया संकट के प्रभाव झलकने लगे हैं: वित्त मंत्रायल की मासिक रिपोर्ट

नयी दिल्ली, 29 अप्रैल (वार्ता) वित्त मंत्रालय की बुधवार को जारी मासिक आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के औद्योगिक क्षेत्र के कारोबार पर पश्चिम एशिया संकट का असर चालू वित्त वर्ष के प्रारंभ में दिखने लगा है और इस संकट के कारण उर्वरक क्षेत्र को गैस और रसायन आपूर्ति में रुकावटों का सबसे ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। थोक मुद्रा स्फीति पर भी संकट का असर दिख रहा है, लेकिन खुदरा मुद्रास्फीति अभी मद्धिम बनी हुई है। अप्रैल 2026 माह की रिपोर्ट में कहा गया है कि कारोबारी माहौल नरम पड़ा है, जबकि ई-वे बिल की संख्या भले ही मार्च 2026 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गयी हो, लेकिन वृद्धि की दर नवंबर 2025 के लगभग 30 प्रतिशत के शीर्ष स्तर से नीचे आ गयी गयी है। रिपोर्ट के अनुसार समय -समय पर आने वाले अन्ये आंकडे़ भी मार्च, 2026 में आपूर्ति पक्ष में कुछ नरमी का संकेत देते हैं। ऐसा मुख्य रूप से पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के शुरुआती असर के रूप में दिखता है।
मासिक समीक्षा

रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि, मांग पक्ष के संकेतक काफी हद तक मज़बूत बने हुए हैं और देश की अर्थव्यवस्था अब तक की नीतिगत प्रतिक्रिया ने लंबी अवधि की प्राथमिकताओं से समझौता किये बिना भी तात्कालिक रुकावटों का सामना करने में समर्थ दिखती है। रिपोर्ट के अनुसार खुदरा मुद्रास्फीति मध्यम बनी हुई है1 मार्च में यह 3.4 प्रतिशत थी। घरेलू ईंधन की बढ़ती कीमतों से बचाने के लिए किये गये नीतिगत उपायों से खुदरा मंहगायी नीचे रखने में मदद मिली है। थोक कीमतों में बढ़ोतरी लागत-जनित दबावों के उभरने का संकेत देती है, जो अगर आपूर्ति में रुकावटें बनी रहीं, तो उपभोक्ता मुद्रास्फीति में बदल सकते हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने सतर्क रुख बनाये रखा है, रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा है, जबकि दूसरे दौर के प्रभावों पर बारीकी से नज़र रखी जा रही है। सिस्टम में तरलता अधिशेष की स्थिति बनी हुई है और बैंक ऋण वृद्धि मजबूत और व्यापक आधार वाली है। गत 31 मार्च, 2026 तक, बैंक ऋण में साल-दर-साल 17.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, हालांकि पश्चिम एशिया में चल रहे संकट ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के लिए ऋण की मांग और शर्तों के बारे में बैंकों के उत्साह को थोड़ा कम कर दिया है। वित्तीय अस्थिरता का हालांकि कोई खतरा नहीं है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश का व्यापार प्रदर्शन, वैश्विक व्यापार के अस्थिर माहौल के बावजूद, मज़बूती दिखाता है। कुल निर्यात (वस्तुएं और सेवाएं) में साल-दर-साल 4.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो 860.1 अरब अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गया। इसके अलावा, गैर-पेट्रोलियम निर्यात 387.8 अरब डॉलर के ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गया, जबकि सेवाओं का निर्यात पहली बार 400 अरब अमेरिकी डॉलर के आंकड़े को पार कर गया, जो 418.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया।

पश्चिम एशिया में संकट के प्रभाव मार्च 2026 के व्यापार आंकड़ों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, जिसके दौरान कुल निर्यात और आयात में क्रमशः 4.6 प्रतिशत और 5.7 प्रतिशत की गिरावट आयी। वित्त वर्ष 26 की दूसरी छमाही के नियमित मासिक श्रम-शक्ति सर्वे (पीएलएफएस) के आंकड़ों से पता चलता है कि श्रम बाजार में धीरे-धीरे स्थिति मजबूत हो रही हैं। श्रमिकों की भागीदारी भागीदारी बढ़ रही है, बेरोज़गारी घट रही है और मासिक उतार-चढ़ाव एक सीमित दायरे में हैं। रोज़गार बाजार की संरचना में बदलाव आया है, और अब लोग नियमित वेतन वाले रोज़गार और गैर-कृषि गतिविधियों की ओर ज़्यादा झुक रहे हैं। इसके अलावा, नीति आयोग की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले एक दशक में महिलाओं की ऋण तक पहुंच में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है।

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