इस्लामाबाद | अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक युद्धविराम समझौते में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर नए और चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान इस कूटनीतिक प्रक्रिया में कोई मुख्य मध्यस्थ (Mediator) नहीं था, बल्कि वह केवल एक ‘संदेशवाहक’ की भूमिका निभा रहा था। असल में, यह समझौता चीन और अमेरिका के बीच पर्दे के पीछे हुई गुप्त बातचीत का परिणाम था। पाकिस्तान ने केवल एक माध्यम के रूप में कार्य किया, जिससे बीजिंग बिना सामने आए तेहरान और वॉशिंगटन तक अपनी रणनीतिक बातें पहुंचा सका। इस खुलासे ने उन अंतरराष्ट्रीय दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनमें इस शांति प्रक्रिया का पूरा श्रेय पाकिस्तानी नेतृत्व को दिया जा रहा था।
कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस युद्धविराम की रूपरेखा पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार की बीजिंग यात्रा के दौरान ही तैयार कर ली गई थी। चीन आमतौर पर ऐसे हाई-प्रोफाइल मामलों में सीधे तौर पर शामिल होने से बचता है ताकि विफलता की स्थिति में उसकी वैश्विक छवि को नुकसान न पहुंचे। इसी कारण पाकिस्तान का उपयोग एक ‘पब्लिक पार्टनर’ के रूप में किया गया। इस शांति प्रस्ताव में विशेष रूप से ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ जैसे संवेदनशील क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया, जो चीन के व्यापारिक हितों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ईरान ने भी इस समझौते को केवल इसलिए स्वीकार किया क्योंकि इसके पीछे चीन एक अघोषित गारंटर के रूप में खड़ा था।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लिए यह स्वीकार करना राजनीतिक रूप से कठिन था कि वैश्विक शांति के लिए वे चीन के प्रभाव पर निर्भर हैं। दूसरी ओर, पाकिस्तान ने इस कूटनीतिक शून्य को भरकर अमेरिका को एक सार्वजनिक चेहरा प्रदान किया। हालांकि, इस समझौते के कई जटिल और राजनीतिक मुद्दे अब भी अस्पष्ट रखे गए हैं, जो भविष्य में तनाव का कारण बन सकते हैं। फिलहाल के लिए, यह स्पष्ट हो गया है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के इस बड़े खेल में पाकिस्तान की हैसियत केवल एक पोस्टमैन की थी, जबकि असली नियंत्रण बीजिंग के हाथों में रहा। इस घटनाक्रम ने दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में चीन के बढ़ते कूटनीतिक दबदबे को एक बार फिर प्रमाणित कर दिया है।

