ढाका | बांग्लादेश के हालिया संसदीय चुनावों में ऐतिहासिक विरासत और भावनाओं का जबरदस्त प्रभाव देखने को मिला है। 12 फरवरी को हुए मतदान में बीएनपी (BNP) ने 1971 के मुक्ति संग्राम की यादों को ताजा कर मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में सफलता हासिल की। अवामी लीग की अनुपस्थिति में, बीएनपी ने जमात-ए-इस्लामी (JI) की स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रही विवादित भूमिका को मुख्य मुद्दा बनाया। मुक्ति युद्ध से भावनात्मक जुड़ाव रखने वाले मतदाताओं ने बीएनपी की इस रणनीति का समर्थन किया और उन ताकतों को खारिज कर दिया जिन्होंने देश की आजादी का विरोध किया था।
चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री तारिक रहमान और महासचिव मिर्ज़ा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने जमात-ए-इस्लामी पर तीखे हमले किए। सिलहट की रैली में तारिक रहमान ने स्पष्ट किया कि इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता और देश की आजादी के विरोधियों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। बीएनपी ने अपनी पुरानी राजनीतिक मजबूरियों को पीछे छोड़ते हुए खुद को मुक्ति संग्राम की विरासत का रक्षक बताया। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य उन संवेदनशील वोटरों को एकजुट करना था, जो जेआई के सत्ता में आने की संभावना से चिंतित थे और देश के बुनियादी मूल्यों की सुरक्षा चाहते थे।
रिपोर्टों के अनुसार, बीएनपी की जीत केवल विकास के वादों पर नहीं, बल्कि जमात-ए-इस्लामी के प्रति जनता के डर पर आधारित थी। मतदाताओं को यह डर था कि यदि जेआई सत्ता में आती है, तो 1971 की गौरवशाली आजादी के मूल्य कमजोर पड़ जाएंगे। बीएनपी ने खुद को एकमात्र देशभक्त विकल्प के रूप में पेश कर भारी जनसमर्थन जुटाया, जिससे जमात-ए-इस्लामी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। यह चुनाव परिणाम दर्शाता है कि बांग्लादेश की जनता आज भी अपने स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों और राष्ट्रीय पहचान को किसी भी राजनीतिक समझौते से ऊपर रखती है।

