आईटी नियमों में प्रस्तावित संशोधन सरकारी शक्तियों को बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि केवल स्पष्टीकरण के लिए हैं—आईटी सचिव एस. कृष्णन ने डिजिटल सेंसरशिप की चिंताओं को किया खारिज

नई दिल्ली | इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सचिव एस. कृष्णन ने स्पष्ट किया है कि सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियमों में किए जा रहे नए संशोधन सरकार के अधिकारों के विस्तार के लिए नहीं हैं। एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान उन्होंने जोर देकर कहा कि ये बदलाव केवल “स्पष्टीकरण प्रकृति” के हैं ताकि नियमों की व्याख्या में कोई भ्रम न रहे। सचिव ने उन अटकलों को खारिज कर दिया जिनमें हालिया कंटेंट टेकडाउन (सामग्री हटाने) की कार्रवाइयों को इन संशोधनों से जोड़ा जा रहा था। उन्होंने बताया कि सामग्री हटाने की शक्तियाँ पहले से ही मौजूदा कानूनों के तहत सरकार के पास सुरक्षित हैं और नए संशोधनों का उद्देश्य केवल कानूनी प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और पारदर्शी बनाना है।

पिछले कुछ महीनों में सोशल मीडिया पोस्ट को ब्लॉक करने की बढ़ती घटनाओं पर जवाब देते हुए आईटी सचिव ने ‘डीपफेक’ और एआई-जनरेटेड भ्रामक सामग्री को मुख्य कारण बताया। उन्होंने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर कृत्रिम रूप से तैयार की गई सिंथेटिक सामग्री की बाढ़ आ गई है, जो समाज के लिए एक वैश्विक चुनौती बन चुकी है। यह कार्रवाई किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित नहीं है, बल्कि तकनीक के दुरुपयोग को रोकने के लिए की गई एक आवश्यक सुरक्षात्मक पहल है। सरकार का प्राथमिक उद्देश्य इंटरनेट को सुरक्षित बनाना है, ताकि गलत सूचनाओं और भ्रामक वीडियो के जरिए जनता को गुमराह न किया जा सके।

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि वह ‘मध्यस्थ’ (जैसे फेसबुक, एक्स) और ‘समाचार प्रकाशक’ की जिम्मेदारियों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखने के पक्ष में है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने चिंता व्यक्त की थी कि उन्हें पारंपरिक प्रकाशकों की तरह उत्तरदायी नहीं ठहराया जाना चाहिए, जिस पर सरकार विचार कर रही है। दूसरी ओर, इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) जैसे संगठनों ने इन बदलावों को “डिजिटल सेंसरशिप” बताते हुए इनका विरोध किया है। मंत्रालय ने आश्वासन दिया है कि वह नागरिक समाज और टेक कंपनियों सहित सभी हितधारकों के सुझावों के लिए “खुला” है और अंतिम नियमों को लागू करने से पहले सभी पहलुओं पर बारीकी से विचार किया जाएगा।

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