जिले में पशु चिकित्सकों के आधे पद खाली, स्वीकृत 32 में से 16 ही पद भरे, शेष खाली 

ब्यावरा/राजगढ़। शासन द्वारा पशुओं को उचित उपचार मिल सके इस हेतु लाखों रुपये खर्च कर विशालकाय भवन, बेहतर उपचार हेतु अत्याधुनिक सुविधाएं जुटाई जा रही है किंतु उपचार करने वाले पशु चिकित्सकों की ही कमी बनी हुई है. इन परिस्थितियों के चलते तमाम सुविधाओं के बावजूद बीमार पशुओं को बेहतर उपचार की सुविधा नहीं मिल पा रही है. पशु पालकों को प्रायवेट तौर पर अतिरिक्त खर्च कर बीमार पशुओं का उपचार कराने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.

गौरतलब है कि जिले में 20 पशु चिकित्सालय एवं 40 पशु औषद्यालय है, इनके लिए जिले में 32 पशु चिकित्सक एवं 92 सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्राधिकारी के पद स्वीकृत है. पशु चिकित्सा विभाग के अनुसार स्वीकृत पशु चिकित्सक के 32 में से 16 ही पशु चिकित्सक पदस्थ है, जबकि 92 सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्राधिकारी के स्वीकृत पद में से 59 पद पर ही पशु चिकित्सा क्षेत्राधिकारी पदस्थ है. इस तरह सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्राधिकारी के 33 पद रिक्त है. लखनवास सहित अन्य कई जगहों पर स्थित पशु औषद्यालयों में अधिकांश समय ताले लटके रहते हैै.

लाखों की संख्या में मवेशी

जिले में मवेशियों की संख्या ही लाखों में है. जानकारी के अनुसार जिले में लगभग 5 लाख के आसपास गौवंश, भैंस, बैल है. इसके अतिरिक्त बकरी, भेड़ व अन्य पशुओं की संख्या इनसे कहीं अधिक लाखों में है. इतनी बड़ी तादाद में मवेशी, पशुओं का उपचार करने वालों की संख्या ऊंट के मुंह में जीरे के समान नाममात्र है.

अतिरिक्त राशि खर्च करना पड़ती ईलाज के लिए

ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित कई पशु औषद्यालय, पशु चिकित्सकों की कमी के चलते शोपीस बने हुए है. इन हालातों के चलते पशु पालकों को बीमार मवेशी, पशुओं का उपचार प्रायवेट तौर पर कराना पड़ता है. जिससे एक अच्छी खासी राशि खर्च हो जाती है. इससे आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है.

उप संचालक, सर्जन का पद भी रिक्त

एक और जहां पशु चिकित्सक, सहायक पशु क्षेत्राधिकारी के आधे पद रिक्त है वहीं उप संचालक, सर्जन का पद भी रिक्त है. जिले में लम्बे समय से पशु चिकित्सकों की कमी के कारण बीमार पशुओं उपचार में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. पशुओं का उपचार कराने पशु पालक प्रायवेट प्रेक्टिस करने वालों के भरोसे ही रहते है.

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