महाकौशल की डायरी
अविनाश दीक्षित: न वर्चस्व चला न रसूख चला और न ही सिफारिशों का दौर… सब कुछ धरा का धरा रह गया जब हाईकोर्ट ने एसआईटी की जांच रिपोर्ट देखने के बाद सख्ती दिखाकर फरमान जारी किया…अंत में जबलपुर के लार्डगंज पुलिस थाना को थक हारकर पूर्व महापौर व भाजपा नेता प्रभात साहू, शुभम अवस्थी, महेंद्र रैकवार, विजय सोनी और अभिनंदन जायसवाल को नामजद आरोपी बनाना पड़ा। जैसे ही राजनैतिक गलियारों में खबर फैली कि प्रभात साहू को आरोपी बना लिया गया है ठीक वैसे ही विपक्ष के गलियारों में चर्चाएं तेज हो गईं कि सत्ता का प्रभाव सिर्फ पुलिस थाने तक ही चला कोर्ट के दरवाजे में बेदम हो गया।
मामला विगत सितंबर 2025 का बल्देवबाग चौराहे का है जहां हेल्मेट चैकिंग के दौरान आरक्षक कृष्ण कुमार पाल का पूर्व महापौर से विवाद हुआ था। घटना के बाद लार्डगंज पुलिस ने पूर्व महापौर की शिकायत पर तो संबंधित पुलिसकर्मी के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज कर ली थी, लेकिन पुलिसकर्मी की शिकायत में नाम होने के बावजूद आरोपियों के खिलाफ मामला अज्ञात में दर्ज किया गया था। इस दोहरे रवैये को लेकर सवाल उठे और मामला हाईकोर्ट तक जा पहुंचा । अधिवक्ता मोहित वर्मा ने इस मामले को जनहित याचिका के जरिए हाईकोर्ट में उठाया। याचिका में कहा गया कि कानून सबके लिए समान होना चाहिए, चाहे वह आम नागरिक हो या कोई रसूखदार नेता।
कोर्ट ने इस तर्क को गंभीरता से लेते हुए पहले पुलिस की जांच पर सवाल उठाए और फिर मामले को एसआईटी को सौंप दिया था। चर्चाएं जोरों पर थीं कि सत्ताधारी भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रभात साहू के खिलाफ पुलिस कार्रवाई करने से डर रही है लेकिन हाईकोर्ट की सख्ती के बाद एसटीएफ ने पूर्व महापौर प्रभात साहू समेत पांच लोगों को नामजद आरोपी बना लिया। मतलब साफ है कि पूर्व महापौर की मुश्किलें कम नहीं होने वालीं हैं। उधर कांग्रेसियों का मन मयूर हो रहा है, कांग्रेसियों के हाव भाव से लग रहा है कि जैसे उन्होंने किसी चुनाव में जीत दर्ज कर ली हो। इसके साथ ही वह आरक्षक भी अपने साथियों के साथ खुश नजर आया जो कि अपने ही विभाग के पुलिस थाना में भाजपा नेता की नामजद रिपोर्ट दर्ज कराने जूझ रहा था ।
याद आ गया “गंगाजल” का सीन ….
कटनी जिले के बहोरीबंद इलाके में खाकी ने ईमानदारी और अनोखी कार्रवाई की मिसाल पेश की तो सभी को हिंदी सिनेमा जगत की फिल्म गंगाजल का वह सीन याद आ गया जब अभिनेता अजय देवगन ट्रक में वेश बदलकर बैठे और फिर चालक से पुलिस कर्मियों द्वारा की जा रही अवैध वसूली का भंडाफोड़ करते हुए दोषी को जमकर फटकार लगाई। कुछ इस तरह ही कटनी में वेश बदलकर पहले तो दो महिला अधिकारी ग्रामीण महिलाओं के रूप में ट्रैक्टर में बैंठीं फिर उन्होंने एक आरक्षक को 500 रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा। विदित हो कि कटनी एसपी अभिनय विश्वकर्मा को लगातार शिकायतें मिल रहीं थीं कि पुलिस कर्मी किसानों और टै्क्टर चालकों से अवैध वसूली कर रहे हैं, जिसके बाद उन्होंने पुलिस कर्मियों को ट्रैप करने योजना बनाई।
योजना के तहत स्लीमनाबाद एसडीओपी आकांक्षा चतुर्वेदी और प्रशिक्षु डीएसपी शिवा पाठक ने पूरी कार्रवाई को अंजाम दिया। फिल्मी अंदाज की गई इस कार्रवाई से सिर्फ कटनी ही नहीं, प्रदेश के पुलिस महकमे में हलचल मची है। इस कार्रवाई से वर्दी की आड़ में भ्रष्टाचार का लंबा खेल खेलने और निर्दोष लोगों का शोषण करने वाले भौँचक हैं। खबर है कि पुलिस कप्तान ने बहोरीबंद टीआई अखिलेश दाहिया को लाइन अटैच कर दिया है तो वहीं रिश्वत लेते पकड़े गए आरक्षक लक्ष्मण पटैल को निलंबित कर दिया गया है। सवाल अब ये खड़े हो रहे हैं कि क्या खाकी के खिलाफ ही पुलिस की ये कार्रवाई मिसाल बनकर भ्रष्ट , अवैध वसूली करने वाले पुलिस कर्मियों को डराएगी या फिर भ्रष्ट पुलिस कर्मियों का पुराना ही रवैया बरकरार रहेगा…?
समिति के प्रबंधक ने जमाई तगड़ी सेटिंग
जबलपुर जिले के मझौली में उपार्जन का इकलौता ऐसा मामला सामने आया जिसमें समिति के प्रबंधक को छोड़कर सिर्फ प्रभारी और एक ऑपरेटर पर एफआईआर दर्ज की गई। जैसे ही ये बात बाहर निकली ठीक वैसे ही चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। मझौली में धान घोटाले में हुई प्रशासन की कार्रवाई में जहां एक ओर सवाल खड़ेे हुए तो वहीं दूसरी तरफ कलेक्ट्रेट के गलियारों से लेकर मझौली उपार्जन समिति के गलियारों में ये चर्चाएं जोरों पर थीं कि समिति के प्रबंधक ने ऊंचे लेवल का ऐसा सेटअप जमाया कि सिर्फ उन पर कार्रवाई नहीं हुई जबकि उनके नीचे के कर्मचारियों पर एफआईआर तक दर्ज हो गई। जमीनी हकीकत की बात करें तो प्रबंधक के बायोमेट्रिक या ओटीपी के बिना कोई भी धान उपार्जन की एंट्री संभव नहीं है। बावजूद इसके प्रबंधक को कार्रवाई की जद से दूर रखा गया। अब ये बात किसी को हजम नहीं हो रही है और मांग उठने लगी है कि अगर मझौली की समिति के कर्मचारी दोषी हैं तो फिर प्रबंधक पर भी प्रशासन कार्रवाई सुनिश्चित करे।
सर्वविदित है कि पिछले दो सालों में उपार्जन घोटाले को लेकर जितने भी मामले दर्ज किए गए हैं उनमें प्रबंधन पर एफआईआर दर्ज की गई थी। खबर तो ये भी है कि सहकारिता के कुछ अधिकारियों के माध्यम से खाद्य और उपार्जन से जुड़े कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का सेटअप तैयार हुआ जिसके बाद प्रबंधक को बचा लिया गया। उधर जिला कलेक्टर की ओर अब सभी की नजरें टिकीं हुईं है कि क्या वे मझौली समिति के प्रबंधक को रडार पर लेते हैं कि नहीं. क्योंकि मांगों की बात करें तो प्रशासन के दोहरे चरित्र और संदिग्ध कार्यशैली अब स्पष्ट रूप से कटघरे में खड़ी नजर आ रही है। वहीं जिन कर्मचारियों पर एफआईआर दर्ज की गई है वे भी अंदर ही अंदर घुट रहे हैं कि मिलीभगत जब सभी की थी तो फिर कार्रवाई की गाज सिर्फ हम पर ही क्यों…?
