मुंबई | फिल्म ‘केडी: द डेविल’ के गाने ‘सरके चुनर’ को लेकर उपजे विवाद ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में कला की मर्यादा पर नई बहस छेड़ दी है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की सख्ती और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से गाने को हटाए जाने के बाद सीबीएफसी (CBFC) के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने स्पष्ट किया है कि डिजिटल कंटेंट बोर्ड के प्रमाणन के दायरे में नहीं आता। इस पर दिग्गज गीतकार समीर अनजान ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जब ओटीटी पर गालियां और सेक्स खुलेआम दिखाया जा रहा है, तो केवल गानों पर निशाना क्यों साधा जा रहा है? उन्होंने तर्क दिया कि यदि सरकार डिजिटल कंटेंट को नियंत्रित नहीं कर सकती, तो सेंसर बोर्ड की प्रासंगिकता पर भी विचार होना चाहिए।
विवाद की आंच अब गानों के रचनाकारों तक पहुंच गई है। ‘सरके चुनर’ के गीतकार रकीब आलम ने निर्देशक प्रेम पर ‘वल्गर’ लिरिक्स के लिए दबाव बनाने का आरोप लगाया है, वहीं नोरा फतेही ने भाषा की समझ न होने का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया है। इस पर कवि ए.एम. तुराज ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि कलाकार भी उतने ही दोषी हैं, क्योंकि वे अनपढ़ नहीं हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि कई बार आर्थिक मजबूरी में लेखकों को निर्देशकों की बात माननी पड़ती है, लेकिन कला में अश्लीलता की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। 80 और 90 के दशक के ‘चोली के पीछे’ और ‘सरकाई लो खटिया’ जैसे गानों का उदाहरण देते हुए समीर ने कहा कि लेखक केवल शब्द देता है, उसे ‘सिडक्टिव’ बनाने का काम निर्देशक और कोरियोग्राफर का होता है।
गीतकार प्रिया सरैया का मानना है कि विवाद बोल से ज्यादा गानों के फिल्मांकन और महिलाओं के वस्तुकरण (Objectification) को लेकर है। उन्होंने कहा कि ‘आज की रात’ जैसे आधुनिक गानों में रोमांस है, अश्लीलता नहीं। हालांकि, उन्होंने यह भी याद दिलाया कि भारतीय लोक संगीत और शादियों के पारंपरिक गीतों में हमेशा से एक प्रकार की ‘शरारत’ और ‘द्विअर्थी’ संवाद रहे हैं, जो हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि बाहरी सेंसरशिप के बजाय फिल्म जगत को ‘सेल्फ-रेगुलेशन’ यानी आत्म-अनुशासन अपनाना चाहिए। फिलहाल, ‘सरके चुनर’ और बादशाह के ‘टटीरी’ जैसे गानों पर हुई कार्रवाई ने यह संकेत दे दिया है कि अब दर्शक और सरकार दोनों ही कंटेंट की शुचिता को लेकर अधिक सजग हो गए हैं।

