पटना | बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोमवार को राज्य विधान परिषद (MLC) की सदस्यता से अपना आधिकारिक त्यागपत्र सौंप दिया है। यह कदम 16 मार्च को उनके राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुने जाने के बाद उठाया गया है। संवैधानिक नियमों के अनुसार, ऊपरी सदन (राज्यसभा) का सदस्य बनने के 14 दिनों के भीतर राज्य के सदन की सदस्यता छोड़ना अनिवार्य होता है, अन्यथा राज्यसभा की सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है। नीतीश कुमार, जो 2006 से लगातार चौथी बार विधान परिषद के सदस्य रहे हैं, अब 10 अप्रैल को नई दिल्ली में राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ग्रहण कर सकते हैं।
नीतीश कुमार के राजनीतिक करियर में यह इस्तीफा एक नए अध्याय की शुरुआत है। राज्यसभा की सदस्यता ग्रहण करने के साथ ही वे भारत के उन विरले राजनेताओं की सूची में शामिल हो जाएंगे, जिन्होंने राजनीति के चारों सदनों—विधानसभा, लोकसभा, विधान परिषद और अब राज्यसभा—की सदस्यता हासिल की है। 1985 में हरनौत से विधायक बनकर अपने संसदीय सफर की शुरुआत करने वाले नीतीश कुमार ने 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से हमेशा विधान परिषद के जरिए ही सत्ता की कमान संभाली है। केंद्र में मंत्री और लोकसभा सांसद के रूप में लंबा अनुभव रखने वाले नीतीश अब देश के सबसे बड़े सदन में बिहार का प्रतिनिधित्व करेंगे।
विधान परिषद से इस्तीफा देने के बाद तकनीकी रूप से नीतीश कुमार वर्तमान में किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं, लेकिन वे संवैधानिक प्रावधानों के तहत अगले छह महीने तक मुख्यमंत्री पद पर बने रह सकते हैं। इस अवधि के भीतर उन्हें पुनः विधानसभा या विधान परिषद की सदस्यता हासिल करनी होगी। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राज्यसभा जाना उनके लंबे राजनीतिक सफर का एक नया मोड़ है, जो राज्य और केंद्र की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर सकता है। फिलहाल, 10 अप्रैल को होने वाले उनके शपथ ग्रहण समारोह पर सभी की निगाहें टिकी हैं, जिसके बाद वे औपचारिक रूप से उच्च सदन के सदस्य बन जाएंगे।

