
सिंगरौली। नेहरू शताब्दी चिकित्सालय जयंत में प्रसूता के ऑपरेशन को लेकर उपजे विवाद में अब नया मोड़ आ गया है। पार्षद परमेश्वर पटेल द्वारा लगाए गए आरोपों पर गायनिक विशेषज्ञ डॉ. नेहा सिंह ने विस्तार से जवाब देते हुए सभी आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बताया है। उन्होंने कहा कि बिना ठोस तथ्यों के लगाए गए आरोप उनकी छवि को धूमिल करने की साजिश का हिस्सा हैं।
डॉ नेहा सिंह ने अपना पक्ष रखते हुये बताया कि कंचन कुमारी 9 मार्च को प्रसव के लिए अस्पताल में भर्ती हुई थीं, जहां उसी दिन इन्ही के साथ कुल पांच महिलाओं का इमरजेंसी सफल ऑपरेशन किया गया। 10 मार्च को आवश्यक कार्य के चलते मुझे अवकाश लेकर दिल्ली जाना पड़ा। इस दौरान 10 एवं 11 मार्च को वरिष्ठ चिकित्सक डॉ महेश सिंह ने मरीज सहित भर्ती महिलाओं का परीक्षण किया और उनकी स्थिति सामान्य पाई गई। उन्होंने बताया कि इसी बीच डॉ महेश सिंह के घर में अचानक कैजुअल्टी होने के कारण उन्हें अवकाश लेना पड़ा, लेकिन उससे पहले वे दो दिनों तक मरीजों की बेहतर तरीके से निगरानी कर चुके थे। इसके बाद डॉ वंदना ने अवकाश पर होने के बावजूद आकर मरीजों को देखा। 13 मार्च को अस्पताल में गायनिक विशेषज्ञों के कतिपय कारणों से न रहने के कारण केन्द्रीय चिकित्सालय सिंगरौली में कार्यरत चिकित्सक डॉ प्रियंका सिंह की ड्यूटी लगाई गई, जिन्होंने कंचन सहित अन्य मरीजों का परीक्षण किया। सभी मरीजों की स्थिति संतोषजनक बनी रही। इधर डॉ नेहा सिंह 13 मार्च को सिंगरौली वापस लौटीं और नवजात शिशु कुकी में होने के कारण 14 मार्च का ेडिस्चार्ज किया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी चिकित्सक द्वारा मरीज की हालत गंभीर नहीं बताई गई और सभी मेडिकल रिकॉर्ड इस बात की पुष्टि करते हैं। डॉ. सिंह ने पार्षद परमेश्वर पटेल पर बिना तथ्य जांचे आरोप लगाने और मीडिया के माध्यम से भ्रम फैलाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि न तो वे मरीज को व्यक्तिगत रूप से जानती हैं और न ही कोई निजी विवाद है, इसके बावजूद इस तरह के आरोप लगाना दुर्भावना को दर्शाता है। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष मेडिकल जांच कराने की मांग करते हुए कहा कि यदि वे दोषी पाई जाती हैं तो कार्रवाई हो, अन्यथा झूठे आरोप लगाने वालों के खिलाफ वे न्यायालय की शरण लेंगी।
शिकायत की टाइमलाइन और चिकित्सकीय कारणों पर उठे सवाल
पार्षद द्वारा दिए गए शिकायत पत्र में उल्लेख किया गया है कि 15 मार्च को परिजन कंचन कुमारी को लेकर कोलकाता के एक नर्सिंग होम में इलाज के लिए रवाना हो गए थे, जहां 18 को सीटी स्कैन और अन्य जांच कराई गई। लेकिन संलग्न दस्तावेजों में बैढ़न स्थित अल्ट्रासाउंड सेंटर की रिपोर्ट में 16 मार्च को कराया और अल्ट्रासाउंड के रिपोर्ट में कहीं भी खून का थक्का का जिक्र नही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब 15 मार्च को ही कोलकाता के लिए रवाना हो चुके थे, बैढ़न में 16 मार्च को अल्ट्रासाउंड कैसे कराया गया। यह विरोधाभास शिकायत की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े कर रहा है। चिकित्सको के अनुसार ब्लड क्लॉटिंग जैसी समस्या कई परिस्थितियों में उत्पन्न हो सकती है। जैसे लंबी दूरी की यात्रा के दौरान लगातार झटके लगना, उबड़-खाबड़ सड़कों पर सफर करना, भारी वजन उठाना या शरीर पर अचानक दबाव पड़ना ये सभी कारण ऐसी स्थिति को जन्म दे सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मरीज को डिस्चार्ज के बाद लंबी यात्रा कराई गई हो, तो इस तरह की जटिलताएं बाद में विकसित हो सकती हैं।
