कृषि सहकारिता में महिलाओं की भागीदारी के लिए जमीन का हक जरूरी: डॉ. डीके वर्मा

इंदौर। कृषि सहकारिताओं में महिलाओं के पिछड़ेपन का कारण उनके नाम जमीन नहीं होना है। इसी कारण वे कृषि सहकारिताओं में पंचायत राज की तरह सहभागिता नहीं कर पाती हैं।

ये विचार जाने-माने समाज विज्ञानी तथा “ब्राउस” के शोध निदेशक डॉ डीके वर्मा ने व्यक्त किए। आप डीएवीवी की अर्थशास्त्र अध्ययनशाला तथा इंदौर डेवलपमेंट फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सेमिनार को संबोधित कर रहे थे। “मध्यप्रदेश की विकास गतिशीलता: मुद्दे और चुनौतियां” विषय वस्तु तथा मप्र में सामाजिक समावेशन और लैंगिक समानता” पर केंद्रित संबोधन में डॉ वर्मा ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्र में कृषि जोतों के अत्यधिक बंटवारे से हालात बिगड़े हैं। कृषि जोतें सुक्ष्म और अति सुक्ष्म आकार में बंट रही है। इससे कृषि उत्पादन प्रभावित हैं। इन जोतों की चकबंदी बड़ी समस्या है। ऐसे “कल्टी लेबर” (जुताई श्रमिक) की स्थिति मजदूरों से भी खराब है। न तो उन्हें जोत स्वामी के लाभ मिलते हैं और न ही श्रमिकों की। आपने बताया कि हाल ही में आईएलओ तथा ब्राउस ( भीमराव अंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय) परियोजना के तहत डही में देश के प्रथम जनजातीय महिला सहकारी समूह गठन के समय इससे जुड़ी चुनौतियां सामने आई।

मंदसौर विश्वविद्यालय कुलाधिपति तथा पूर्व उद्योग मंत्री नरेंद्र नाहटा ने शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न पहलुओं की चर्चा की। डॉ नाहटा ने कुछ उदाहरणों को संदर्भित करते कहा कि जब तक नेता “ना” तथा अफसर “हां” कहना नहीं सीखेंगे तब तक तेज गति से विकास संभव नहीं। ऐसे समय में सिविल सोसाइटी की जिम्मेदारी काफी बढ़ गई हैं। बड़ी ब्याज राशि और कर्ज चुकाने से विकास प्रभावित है।

प्रो गणेश कावड़िया ने “मप्र के कृषि क्षेत्र में बदलाव और आर्थिक विकास” पर केंद्रित उद्बोधन में कहा कि कृषि उत्पादन की स्थिति में व्यापक सुधार हुआ किन्तु मूल्य अर्जित (वैल्यू एडेड) उत्पाद और तीव्र औद्योगिक विकास पर ध्यान देने की जरूरत है। मप्र की कृषि उपज अन्य प्रदेशों में प्रोसेस हो उस प्रदेश के ब्रांड नेम से बिकती हैं। इस स्थिति को बदलने की जरूरत है।

मप्र सामाजिक विज्ञान अनुसंधान संस्थान, उज्जैन के निदेशक डॉ यतीन्द्र सिंह सिसोदिया ने “तृणमूल सुशासन और ग्रामीण क्षेत्र में बदलाव” पर केंद्रित उद्बोधन में “एकीकृत पंचायत राज व्यवस्था, पंचायतों में महिला प्रतिनिधित्व, पेसा कानून -1997 तथा 25 साल बाद यानी 2022 में काफी विलंब से इसकी नियम प्रक्रिया के निर्धारण की चर्चा की। इंदौर डेवलपमेंट फाउंडेशन निदेशक मनोहर देव और प्रो रेखा आचार्य ने समापन उद्बोधन दिया।

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