नई दिल्ली | वित्त मंत्रालय ने शेयर बाजार में सूचीबद्ध (लिस्ट) होने वाली कंपनियों के लिए ‘प्रतिभूति अनुबंध संशोधन नियम, 2026’ अधिसूचित कर दिया है। नए नियमों के तहत, आईपीओ लाने वाली कंपनियों की न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी को अब उनकी निर्गम के बाद की कुल पूंजी (Post-Issue Capital) से जोड़ दिया गया है। जिन कंपनियों की पूंजी 1,600 करोड़ रुपये से 5,000 करोड़ रुपये के बीच है, उन्हें लिस्टिंग के तीन साल के भीतर अपनी सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ाकर कम से कम 25 प्रतिशत करना अनिवार्य होगा। इसके अलावा, लिस्टिंग के समय प्रत्येक वर्ग की प्रतिभूतियों का कम से कम 2.5 प्रतिशत हिस्सा जनता के लिए पेश करना अनिवार्य कर दिया गया है।
संशोधित नियमों में विशाल पूंजी वाली कंपनियों के लिए अलग स्लैब निर्धारित किए गए हैं। यदि किसी कंपनी की लिस्टिंग के बाद की पूंजी 5,000 करोड़ रुपये से लेकर 1 लाख करोड़ रुपये के बीच है, तो उसे कम से कम 1,000 करोड़ रुपये के शेयर सार्वजनिक करने होंगे। ऐसी बड़ी कंपनियों को अपनी पब्लिक शेयरहोल्डिंग 25 प्रतिशत तक पहुँचाने के लिए पाँच साल का समय दिया जाएगा। वहीं, 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी वाली महाकाय कंपनियों को कम से कम 1,500 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर जारी करने होंगे। यह कदम बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने और खुदरा निवेशकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
सेबी (SEBI) द्वारा तय किए गए इन नए मानकों का पालन न करने वाली कंपनियों पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान भी जोड़ा गया है। नए नियम पंजीकृत शेयर बाजारों को यह अधिकार देते हैं कि वे सार्वजनिक शेयरधारिता नियमों के गैर-अनुपालन के लिए संबंधित कंपनियों पर जुर्माना लगा सकें। यह संशोधन उन कंपनियों पर भी लागू होगा जो नियमों के प्रभावी होने से पहले से ही सूचीबद्ध हैं लेकिन मानकों को पूरा नहीं कर रही हैं। सरकार का मानना है कि इस बदलाव से शेयर बाजार में शेयरों की तरलता (Liquidity) बढ़ेगी और बड़ी कंपनियों के स्वामित्व में आम जनता की हिस्सेदारी मजबूत होगी।

