खाड़ी देशों की ‘पेट्रो-डॉलर’ व्यवस्था पर बढ़ा दबाव, ब्रिक्स की भूमिका अहम

..रमेश भान से..
नयी दिल्ली, 13 मार्च (वार्ता) ईरान-अमेरिका-इजराइल के बीच चल रहे संघर्ष के बीच खाड़ी देशों की पेट्रो-डॉलर प्रणाली पर दबाव बढ़ता नजर आ रहा है और ऐसे समय में ब्रिक्स समूह की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से टेलीफोन पर बातचीत के दौरान क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए ब्रिक्स की सक्रिय और रचनात्मक भूमिका की आवश्यकता पर जोर दिया। श्री पेज़ेशकियन ने कहा कि अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के महत्वपूर्ण ढांचे को निशाना बनाए जाने के बावजूद ईरान भारत और अन्य मित्र देशों के साथ ब्रिक्स तथा शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों के माध्यम से सहयोग बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। विश्लेषकों के अनुसार मौजूदा ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध के संदर्भ में पहली बार ब्रिक्स का खुलकर उल्लेख किया गया है, जिससे संकेत मिलता है कि 11 सदस्यीय समूह में शामिल ईरान को इस मंच से समर्थन की उम्मीद है।
बढ़ते संघर्ष ने हालांकि ब्रिक्स के भीतर भी मतभेदों को उजागर किया हैं। ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने अमेरिका-इजराइल के हमलों की आलोचना करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है, जबकि 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहे भारत ने सीधे तौर पर हमलों की निंदा नहीं की है बल्कि संवाद और कूटनीति के जरिए समाधान पर जोर दिया है।

श्री मोदी ने भी श्री पेज़ेशकियन से बातचीत में क्षेत्र में बढ़ते तनाव, नागरिकों की मौत और बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान पर चिंता जताते हुए शांति बहाली के लिए संवाद और कूटनीति को जरूरी बताया। इस बीच ईरान द्वारा यूएई और सऊदी अरब पर हमलों ने ब्रिक्स के कुछ सदस्य देशों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया है, जिससे युद्ध पर संयुक्त बयान जारी करना लगभग असंभव हो गया है। इस संकट ने हालांकि पश्चिमी वित्तीय प्रणाली से स्वतंत्रता की दिशा में प्रयासों को तेज कर दिया है। ब्रिक्सपे प्लेटफॉर्म को स्विफ्ट (एसडब्ल्यूआईएफटी) नेटवर्क के विकल्प के रूप में विकसित करने की दिशा में तेजी आई है। रूस और ईरान पहले ही अपने 90 प्रतिशत द्विपक्षीय व्यापार को राष्ट्रीय मुद्राओं में कर रहे हैं, जबकि अन्य सदस्य भी डॉलर पर निर्भरता कम करने के प्रयास कर रहे हैं।
अमेरिका ने चेतावनी दी है कि यदि कोई ब्रिक्स देश डॉलर को प्रतिस्थापित करने वाली नयी मुद्रा का समर्थन करता है तो उस पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है। विश्लेषण के अनुसार, ईरान और यूएई के ब्रिक्स में शामिल होने के बाद अब यह समूह दुनिया के 40 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल पर नियंत्रण रखता है। इससे लंबे समय में वैश्विक ऊर्जा व्यापार को डॉलर से हटाकर नयी व्यवस्था की ओर ले जाने की संभावना बढ़ सकती है।

विश्लेषण के अनुसार ईरान द्वारा खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमलों को भी इसी व्यापक रणनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है। ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने कहा है कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने बंद होने तक इन हमलों का सिलसिला जारी रहेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने पश्चिम एशिया में अमेरिका की प्रॉक्सी शक्ति के रूप में काम करते हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था में उनकी अहम भूमिका रही है। कतर, बहरीन, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों को निशाना बनाकर ईरान संघर्ष के दायरे को व्यापक बना रहा है। इसका उद्देश्य यह संदेश देना भी माना जा रहा है कि खाड़ी देशों और अमेरिका के बीच बना ‘पेट्रो-डॉलर’ समझौता अब प्रभावी नहीं रहा, क्योंकि मौजूदा हालात में अमेरिका इन देशों को अपेक्षित सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम नहीं दिख रहा है। पृष्ठभूमि में देखें तो ‘पेट्रो-डॉलर प्रणाली’ की शुरुआत अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के कार्यकाल में हुई थी। यह व्यवस्था उस समय बनाई गई जब सोने पर आधारित वैश्विक मौद्रिक प्रणाली कमजोर पड़ने लगी और 1973 का तेल संकट सामने आया। राष्ट्रपति निक्सन ने अमेरिकी डॉलर की सोने में प्रत्यक्ष परिवर्तनीयता समाप्त कर दी, जिससे ब्रेटन वुड्स प्रणाली का अंत हो गया। इसके बाद डॉलर का किसी वस्तु से सीधा संबंध नहीं रहा और उसकी वैश्विक स्थिरता पर सवाल उठने लगे।

डॉलर की वैश्विक मांग बनाए रखने के लिए अमेरिका ने इसे दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु तेल से जोड़ने की रणनीति अपनाई। इसी से ‘पेट्रो-डॉलर’ शब्द प्रचलन में आया। 1973 के अरब तेल प्रतिबंध के बाद अमेरिका और सऊदी अरब के बीच 8 जून 1974 को एक ऐतिहासिक समझौता हुआ। इसके तहत सऊदी अरब ने अपना तेल केवल अमेरिकी डॉलर में बेचने और कीमत तय करने पर सहमति दी। इसके बदले सऊदी अरब ने तेल से होने वाली बड़ी आय का बड़ा हिस्सा अमेरिकी अर्थव्यवस्था में निवेश करने, खासकर अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड खरीदने पर सहमति जताई। इसके बदले अमेरिका ने सऊदी अरब को सैन्य सुरक्षा, हथियार और तकनीकी सहायता प्रदान की। दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक होने के कारण सऊदी अरब के इस फैसले का असर अन्य ओपेक देशों पर भी पड़ा और उन्होंने भी तेल व्यापार में डॉलर को अपनाया। इस तरह तेल व्यापार में डॉलर को अनिवार्य बनाने से दुनिया भर में अमेरिकी डॉलर की स्थायी मांग बनी रही और बिना सोने के समर्थन के भी डॉलर वैश्विक रिजर्व मुद्रा के रूप में मजबूत बना रहा। विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा संघर्ष, स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ (जलडमरूमध्य) में तनाव और ईरान द्वारा खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर हमलों के बीच यह पूरी व्यवस्था अब नई चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे में ब्रिक्स जैसे मंच की भूमिका भविष्य में और अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

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