दुनिया इस समय गहरे भू-राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रही है. यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व का तनाव, महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा और आर्थिक अस्थिरता ने वैश्विक व्यवस्था को असमंजस की स्थिति में खड़ा कर दिया है. ऐसे समय में नई दिल्ली में आयोजित रायसीना डायलॉग 2026 केवल एक कूटनीतिक सम्मेलन नहीं, बल्कि वैश्विक चिंतन का मंच बन गया है. इसके उद्घाटन सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए.
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण की शुरुआत ही उस संदेश से की जो आज की दुनिया के लिए सबसे अधिक प्रासंगिक है, ‘यह युग युद्ध का नहीं है.’ यह वाक्य पिछले कुछ वर्षों में भारत की विदेश नीति का केंद्रीय सूत्र बन चुका है. यूक्रेन से लेकर मध्य पूर्व तक फैले संघर्षों की ओर संकेत करते हुए उन्होंने स्पष्ट कहा कि रणभूमि स्थायी समाधान नहीं देती. संवाद, कूटनीति और सहयोग ही वह रास्ता है जो मानवता को विनाश से बचा सकता है. यह संदेश केवल नैतिक आग्रह नहीं, बल्कि उस देश की आवाज है जिसने स्वयं को वैश्विक शक्ति-संतुलन के बीच एक जिम्मेदार मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया है.रायसीना डायलॉग में प्रधानमंत्री के भाषण का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ग्लोबल साउथ का मुद्दा रहा. पिछले कुछ वर्षों में भारत ने विकासशील देशों की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से उठाने का प्रयास किया है. जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भी भारत ने अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य बनवाकर यह संदेश दिया था कि वैश्विक व्यवस्था अब केवल पश्चिमी शक्तियों के इर्द-गिर्द नहीं घूम सकती. रायसीना मंच से प्रधानमंत्री ने कहा कि ग्लोबल साउथ अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनना चाहता है. यह बयान उस बदलते शक्ति संतुलन को रेखांकित करता है जिसमें भारत स्वयं को एक सेतु और नेतृत्वकर्ता दोनों के रूप में देखता है.
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में तकनीक और मानवता के संबंध पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की. कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल क्रांति के युग में उन्होंने चेतावनी दी कि तकनीक का इस्तेमाल मानव कल्याण के लिए होना चाहिए, न कि संघर्ष और नियंत्रण के नए औजार के रूप में. भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल,जिसमें आधार, यूपीआई और डिजिटल सेवाओं का विशाल नेटवर्क शामिल है,आज कई देशों के लिए प्रेरणा बन चुका है. एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा वैश्विक संस्थाओं के सुधार का रहा. संयुक्त राष्ट्र और उससे जुड़ी संस्थाओं की संरचना आज भी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करती है. प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कहा कि 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना 20 वीं सदी के ढांचे से नहीं किया जा सकता. यह टिप्पणी सीधे तौर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और भारत की स्थायी सदस्यता की मांग की ओर संकेत करती है.
प्रधानमंत्री के भाषण का अंतिम और शायद सबसे व्यापक संदेश ‘विश्व-मित्र भारत’ की अवधारणा रहा. भारत ने स्वयं को किसी सैन्य गुट का हिस्सा बनने के बजाय एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत किया है जो संवाद, सहयोग और संतुलन की राजनीति में विश्वास रखता है. यही कारण है कि भारत एक ओर अमेरिका और यूरोप के साथ रणनीतिक साझेदारी विकसित करता है, तो दूसरी ओर रूस, पश्चिम एशिया और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भी अपने संबंध मजबूत रखता है. दरअसल,प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक विमर्श का सक्रिय निर्माता बन चुका है. जाहिर है तेजी से बदलती दुनिया में भारत की यही भूमिका आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है.
