प्रदेश में आखिर क्यों नहीं लागू हुआ एडवोकेट्स प्रोटेक्शन एक्ट

जबलपुर: मप्र प्रदेश के सवा लाख से अधिक वकीलों का पंजीयन करने वाली सर्वोच्च संस्था एमपी स्टेट बार काउंसिल की नवीन कार्यकारिणी के चुनाव की अधिसूचना जारी होने के साथ ही सवालों की झड़ी लगने लगी है। डेमोक्रेटिक लायर्स फोरम के सचिव अधिवक्ता रवींद्र गुप्ता ने इस संबंध में सवाल उठाया है कि प्रदेश में आखिर अब तक एडवोकेट्स प्रोटेक्शन एक्ट क्यों नहीं लागू हुआ। क्या इसे स्टेट बार की असफलता के रूप में न आंका जाए। इसके साथ ही हाई पावर्ड कमेटी के चेयरमैन व चुनाव अधिकारियों को पत्र लिखकर मप्र के वकीलों के हित में प्रविधान किए जाने पर बल दिया है।

अधिवक्ता श्री गुप्ता ने चिंता जताते हुए कहा है कि राज्य में अधिवक्ताओं पर आक्रमण होते रहे, उनके मर्डर होते रहे इसके बावजूद स्टेट बार के सदस्य एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट लाने में विफल रहे। जिस पर उन्हें आत्मचिंतन करना चाहिए। इसी तरह न्यायपालिका को याचिकाओं के माध्यम से बार-बार परिषद की कार्य प्रणाली पर हस्तक्षेप करना पड़ा। यह भी विचारणीय बिंदु है। पत्र में कहा गया है कि अधिवक्ता अधिनियम के अंतर्गत वही व्यक्ति अधिवक्ता के रूप में कार्य कर सकता है, जो कोई अन्य व्यवसाय और नौकरी न करता हो। इसके बावजूद हजारों फर्जी वकीलों का बोझ बढ़ गया है, जिससे वास्तविक वकील और न्याय प्रणाली बुरी तरह प्रभावित हुई है।

इसी तरह स्टेट बार ने विगत 10-15 वर्षों में ऐसा कोई प्रयास नहीं किया की अधिवक्ताओं की सीनियरिटी के बेस पर उनके बैठने के लिए उचित चैंबर और हाल की व्यवस्था की जाए। बल्कि कई बार याचिकाओं के माध्यम से अनाधीकृत रूप से प्रदान किए गए। चैंबर के विषय में लड़ाई अधिवक्ताओं द्वारा लड़ी गई। अधिवक्ता गुप्ता ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले जिसके अनुसार 25 में से सात सदस्य महिला चुनी जानी है संबंध में चयन प्रक्रिया और चुनाव प्रक्रिया का कोई स्पष्टीकरण अभी तक हाई पावर कमेटी द्वारा जारी नहीं किया गया है, जिससे अधिवक्ताओं को किस तरह वोट डालना है और वोट डालने में सात महिलाएं भी चुनी जानी हैं। इस संबंध में कोई भी स्पष्ट आदेश अभी तक प्रदेश की अधिवक्ताओं को नहीं दिए गए हैं। अत: किस तरह से महिलाओं के प्रतिनिधित्व को स्टेट बार में लाया जाएगा, इस पर संदेह है।

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