ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध के गहरे मायने, तेल की कीमतें बढ़ने के साथ प्रभावित होगा वैश्विक बाजार

नयी दिल्ली, 01 मार्च (वार्ता) ईरान-अमेरिका युद्ध को अब केवल दागी गई मिसाइलों के आधार पर नहीं, बल्कि इसकी आर्थिक लागत के आधार पर मापा जा रहा है। तेल की प्रति बैरल कीमत, शेयर बाजार की गिरावट और रद्द की गई उड़ानें इसका स्पष्ट संकेत दे रही हैं।

युद्ध के परिणामस्वरूप जो सामने आ रहा है वह एक अस्थायी झटका नहीं है, बल्कि इसके परिणाम को ऊर्जा, परिवहन, वित्त और आपूर्ति श्रृंखलाओं के संदर्भ में भी आंका जा रहा है।

ईरान और ओमान के बीच स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य इस आकलन के केंद्र में है, क्योंकि यहाँ से वैश्विक तेल खपत का लगभग 25 प्रतिशत और दुनिया की तरलीकृत प्राकृतिक गैस का लगभग पांचवे हिस्से का परिवहन होता है।

भारतीय विदेश व्यापार संस्थान में डब्ल्यूटीओ के पूर्व सदस्य प्रोफेसर विश्वजीत धर ने बताया, “बाजार पहले से ही इस संघर्ष की लागत की गणना कर रहे हैं, क्योंकि जलडमरूमध्य व्यावहारिक रूप से बंद हो गया है। बढ़ती तेल की कीमतों, बीमा लागत, जहाजों की आवाजाही में जोखिम से परिलक्षित हो रहा है।”

शनिवार को ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 67 अमेरिकी डॉलर थी, लेकिन आने वाले दिनों में इसके 70 अमेरिकी डॉलर को पार करने की उम्मीद है। जहाजों के जोखिम बीमाकर्ताओं ने सोमवार को बाजार खुलने से पहले महत्वपूर्ण तेल चोकपॉइंट से गुजरने वाले जहाजों के लिए बीमाओं को रद्द करने के नोटिस पहले ही जारी कर दिए हैं। कुछ बाजार विशेषज्ञों को उम्मीद है कि युद्धग्रस्त जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों के लिए बीमा प्रिमियम वर्तमान 0.25 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत तक जा सकता है।

मूल्यों का बढ़ना या नहीं बढ़ना तीन बातों पर निर्भर करता है। यदि यह संघर्ष बिना किसी बड़ी बाधा के रुक जाता है, तो तेल बाजार कीमतें बढ़ी हुई हो सकती हैं, लेकिन एक सीमा के भीतर होंगी। यदि जलडमरूमध्य बंद हो जाता है, तो कीमतों में निश्चित रूप से भारी वृद्धि होगी। और यदि खाड़ी में तेल उत्पादन सुविधाओं पर हमला होता है तो तेल की कीमतें सबसे अधिक बढ़ेंगी और यह 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल को भी पार कर सकती है।

समस्या का मूल यह है कि खाड़ी और स्वेज नहर मार्ग उचित लागत पर एशिया और यूरोप के बीच तेल परिवहन की सुविधा प्रदान करते हैं। यदि ये मार्ग प्रभावित होते हैं, तो अफ्रीका से घूम कर तेल परिवहन करना पड़ेगा, जिससे परिवहन धीमा होगा, बीमा प्रीमियम बढ़ेगा और अंततः कीमतें बढ़ेंगी। इसलिए होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना कीमतों बढ़ा देगा।

इस झटके का आर्थिक केंद्र एशिया में है, जिसमें चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि ये अर्थव्यवस्थाएं खाड़ी ऊर्जा पर भारी निर्भर हैं, जो होर्मुज से गुजरती है। उनके लिए, बढ़ती कीमतों का सीधा मतलब महंगाई, व्यापक व्यापार घाटा और उनकी मुद्राओं पर दबाव है।

भारत का रुपया फिर से गिरना शुरू हो गया है और एक महीने में एक रुपये की वृद्धि के साथ डॉलर के मुकाबले 91 रुपये से अधिक पर कारोबार कर रहा है। यदि युद्ध जारी रहता है तो इसके और गिरने की आंशका है। भारत का जोखिम विशेष रूप से अधिक है। भारत के कच्चे तेल के आयात का दो-तिहाई और यूरोप तथा उत्तरी अफ्रीका के साथ भारत का आधा समुद्री व्यापार स्वेज या होर्मुज के माध्यम से गुजरता है।

परिवहन की लागत पहले ही बढ़ रही है, लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए इसके और बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है।

रूस, अमेरिका और पश्चिम अफ्रीका के आपूर्तिकर्ता भारत की इस निर्भरता को कम कर सकते हैं लेकिन अल्पावधि में खाड़ी की मात्रा की पूरी तरह से भरपाई नहीं कर सकता है। इसी तरह, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार हफ्तों का कवर प्रदान करते हैं, महीनों का नहीं। ईंधन पर सब्सिडी, कर कटौती, या उत्पाद शुल्क को कम करके उपभोक्ताओं पर बोझ कम किया जा सकता है, लेकिन इससे राजकोषीय घाटा काफी बढ़ सकता है।

ऊर्जा और समुद्री परिवहन के अलावा, दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और अल मकतूम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर संचालन के निलंबन ने खुलासा किया है कि वैश्विक परिवहन क्षेत्रीय स्थिरता से कितनी मजबूती से जुड़ी हुई है।

दुबई वैश्विक विमानन का मुख्य केंद्र है, जो एशिया, यूरोप, अफ्रीका और पश्चिम एशिया को जोड़ता है। इसके अस्थायी बंद होने ने दुनिया भर में एयरलाइन नेटवर्क झकझोर दिया है। सोने की कीमतों में भी इसके कारण प्रभाव देखा गया। कमोडिटी ट्रेडर विक्रम साहनी को लगता है कि अगर युद्ध अपेक्षित अल्पावधि से आगे जारी रहता है, तो सोने में तेजी आएगी और हम इसे 2 लाख रुपये प्रति दस ग्राम के करीब देख सकते हैं।

यदि युद्ध जारी रहता है, तो भारत के बाजारों में सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र निर्यात होगा। जनवरी 2026 में माल और सेवाओं का निर्यात 13.16 प्रतिशत बढ़कर 80.45 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। हालांकि, युद्ध के साथ यह टिकाऊ नहीं होगा।

श्री धर ने कहा, “हमारा निर्यात तीन तरह से प्रभावित होगा। पहला, शिपिंग की लागत बढ़ जाएगी क्योंकि हम बड़े पैमाने पर यूरोप, अमेरिका और अब खाड़ी के युद्ध क्षेत्र में निर्यात करते हैं। दूसरा, कच्चे माल की लागत बढ़ जाएगी, जैसा कि आमतौर पर होता है जब कोई बड़ा युद्ध छिड़ जाता है। तीसरा, हमारी ऊर्जा लागत बढ़ जाएगी।”

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