चीन पर अमेरिका का बड़ा आरोप: गुपचुप तरीके से किया परमाणु परीक्षण

अमेरिका ने चीन पर गुप्त परमाणु परीक्षण का आरोप लगाया है। यह विवाद तब बढ़ा है जब रूस और अमेरिका के बीच की दशकों पुरानी न्यू स्टार्ट संधि खत्म हुई है। चीन ने आरोपों को नकारा है।

ट्रंप प्रशासन ने चीन पर अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करते हुए गुप्त परमाणु परीक्षण करने का गंभीर आरोप लगाया है जिसने वैश्विक स्तर पर हलचल पैदा कर दी है। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि बीजिंग ने अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए सैकड़ों टन क्षमता वाले परीक्षण किए हैं और उन्हें दुनिया से छिपाने की कोशिश की है।

यह अमेरिका चीन परमाणु हथियार विवाद एक ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया की महाशक्तियों के बीच दशकों पुरानी सुरक्षा संधियां अब इतिहास बन चुकी हैं। मौजूदा समय में भविष्य की परमाणु हथियार नियंत्रण वार्ता की दिशा और सुरक्षा समझौतों की सार्थकता पर पूरे विश्व की निगाहें टिकी हुई हैं क्योंकि खतरा लगातार बढ़ रहा है।

गंभीर आरोप

जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र समर्थित निरस्त्रीकरण सम्मेलन के दौरान अमेरिकी हथियार नियंत्रण अधिकारी थॉमस डिनानो ने चीन की गतिविधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका के पास ठोस जानकारी है कि चीन ने सैकड़ों टन क्षमता वाले परमाणु परीक्षणों की तैयारी की और गुप्त टेस्ट भी किए। अमेरिकी पक्ष का मानना है कि चीन ने इन सैन्य गतिविधियों को जानबूझकर छिपाया क्योंकि वे परमाणु परीक्षणों पर लगी वैश्विक रोक का खुला उल्लंघन कर रहे थे।

चीन का इनकार

चीन ने अमेरिका द्वारा लगाए गए इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें पूरी तरह निराधार और झूठे बयानों का पुलिंदा बताकर पल्ला झाड़ लिया है। राजदूत शेन जियान ने स्पष्ट किया कि चीन परमाणु परीक्षणों को स्थगित रखने की अपनी प्रतिबद्धता का पूरी तरह से पालन करता है और आगे भी करता रहेगा। चीन का तर्क है कि अमेरिका अपनी परमाणु निरस्त्रीकरण की जिम्मेदारी से बचने और अपने परमाणु वर्चस्व को सही साबित करने के लिए ऐसे आरोप लगा रहा है।

संधि का अंत

यह सारा विवाद उस समय खड़ा हुआ है जब अमेरिका और रूस के बीच की ‘न्यू स्ट्रैटजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रिटी’ (START) 50 साल बाद आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई है। इस ऐतिहासिक समझौते के तहत दुनिया की इन दो बड़ी महाशक्तियों के तैनात परमाणु हथियारों की संख्या को अधिकतम 1550 तक सीमित रखने का प्रावधान किया गया था। हालांकि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस संधि को एक साल और बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने इसे स्वीकार करने से मना कर दिया।

चीन पर दबाव

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब एक नए और व्यापक परमाणु समझौते की वकालत कर रहे हैं जिसमें रूस के साथ-साथ चीन को भी शामिल करना अनिवार्य है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने चिंता जताई है कि चीन के बिना कोई भी हथियार नियंत्रण ढांचा अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए सुरक्षित नहीं होगा। अबूधाबी में हुई हालिया बैठक में रूस और अमेरिका इस बात पर सहमत हुए हैं कि भविष्य के हथियार नियंत्रण पर बातचीत जल्द शुरू की जानी चाहिए।

बढ़ता परमाणु भंडार

आंकड़ों के अनुसार साल 2020 में चीन के पास करीब 200 परमाणु हथियार थे, जो अब बढ़कर 600 से अधिक की भारी संख्या को पार कर चुके हैं। अमेरिकी खुफिया अनुमानों के मुताबिक अगर परमाणु विकास की मौजूदा रफ्तार जारी रही तो साल 2030 तक चीन के परमाणु हथियारों का भंडार 1000 के आंकड़े को छू सकता है। यही कारण है कि ट्रंप प्रशासन चीन को भी हथियार नियंत्रण वार्ता की मेज पर लाने के लिए लगातार कूटनीतिक दबाव बना रहा है ताकि वैश्विक संतुलन बना रहे।

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