सियासी खींचतान बेड़ा गर्क कर रही सवासौ साल पुरानी विरासत का


हरीश दुबे

ग्वालियर :मेला का आगाज देश के गृह मंत्री अमित शाह के करकमलों से हुआ था, हालांकि शाह ने मेला परिसर में ही आयोजित किए गए एक अन्य सरकारी इजलास में मेला का वर्चुअली शुभारंभ किया था। सीएम सहित सूबे के दीगर बड़े लीडरान और मिनिस्टरों की भी इस जलसे में मौजूदगी रही थी। लेकिन इसके उलट मेला का समापन आज बेहद सादे समारोह में सुंदरकांड के पाठ के साथ हो गया, मिनिस्टरों या बड़े नेताओं को बुलाए बगैर सिर्फ मेला के आयोजन से जुड़े रहे अफसरों की मौजूदगी में। इस बार मेला में शानदार शोरूम और बेहतर प्रदर्शन करने वाले व्यापारियों को इनाम किताब भी नहीं दिए गए।

दो महीने तक मेला की शान बढ़ाने में जी जान लगा देने वाले व्यापारियों को इस बार कशिश है कि कोराना काल से ही महज औपचारिकता और अवनति की ओर बढ़ चले ग्वालियर मेला का शुभारंभ भले ही विधिवत रूप से मेला मंच पर नहीं हो सका लेकिन मेला का समापन समारोह तो भव्यता के साथ करना था। एक दौर वह था जब मेला का शुभारंभ करने के लिए वजीरे आला या माधवराव सिंधिया ग्वालियर तशरीफ लाते थे। बाद के वर्षों में कई मर्तबा माधवराव सिंधिया आते रहे, इस परंपरा का निर्वाह ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी किया। लेकिन जब सिंधिया के समर्थन से शिवराज सिंह की सूबे की सत्ता में दोबारा वापसी हुई, तभी से अन्य निगम मंडलों की तरह ग्वालियर मेला प्राधिकरण भी राजनीतिक रस्साकसी का शिकार हो गया है।

पिछले छह साल से मेला प्राधिकरण बोर्ड का गठन गुटीय राजनीति में अटका हुआ है। सूबे की सत्ता में बैठे सियासतदां सिंधिया के गृहनगर के इस आयोजन में परोक्ष दखल देने से बचते रहे हैं। चूंकि ग्वालियर मेला पूरी तरह राज्य शासन का मसला है, लिहाजा सिंधिया ने भी मेला के मामलात से दूर रहना ही उचित समझा है। यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि ग्वालियर मेला अपनी सौ साल पुरानी शानोशौकत खोता जा रहा है, मेला प्राधिकरण बोर्ड का गठन कर यदि मेला की रौनक वापस लौटाने के लिए दूरदर्शी कदम नहीं उठाए गए तो ग्वालियर का यह विराट आयोजन भी तानसेन समारोह की तरह फॉर्मेलिटी बनकर रह जाएगा।

सदर की ताजपोशी के अर्धवर्ष का जश्न…

ग्वालियर कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन को छह माह पूरे हो गए। नए जिला अध्यक्ष सुरेंद्र यादव के कार्यकाल का अर्धवर्ष पूरा होने पर पार्टी दफ्तर पर हारफूल मालाओं, मिष्ठान और तारीफ के कशीदों के साथ जश्न मनाया गया। भाजपा किसान मोर्चा के महामंत्री सौरभ सिंह को कांग्रेस की सदस्यता दिलाकर सुरेन्द्र यादव ने अपने खाते में एक और उपलब्धि जोड़ी। वैसे यह सच है कि नए सदर ने संगठन को बूथ, वार्ड, ब्लॉक और जिला स्तर पर मजबूत करने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। कुछेक साल से रूठकर घर बैठ गए पुराने नेताओं को मुख्य धारा में वापस लाने के लिए भी मुहिम चलाई जा रही है।

करीब चार दशक तक ग्वालियर कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रहे राजकुमार शर्मा की अनुशासन समिति के सदस्य के रूप में पार्टी दफ्तर पर वापसी हुई है। हालांकि जनहित के मुद्दों पर शहर कांग्रेस ने शहर में कोई बड़ा आंदोलन नहीं छेड़ा है। पीसीसी से आने वाले परिपत्रों के पालन के अनुरूप ही आंदोलनात्मक गतिविधियां चलाई जा रही हैं। शहर के इकलौते कांग्रेस विधायक सतीश सिकरवार से भी नए अध्यक्ष की पटरी नहीं बैठ पाई है, हालांकि पार्टी के पुराने बुजुर्ग नेता बालेन्दु शुक्ला ने शहर सदर और विधायक, दोनों को अपने बंगले पर बुलाकर सुलह सफाई कराने की कोशिश की लेकिन दोनों तरफ तेवरों को देखकर लगता तो यही है कि बात बनी नहीं।

कटारे के अगले कदम से बदल सकती है अटेर की सियासत

हालांकि विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष के पद से अचानक इस्तीफा देकर सियासी हलकों में सरगर्मी पैदा करने वाले हेमंत कटारे ने खुद ही भाजपा में शामिल होने की अटकलों पर यह कहते हुए विराम लगा दिया है कि वे पहले की तरह सदन से सड़क तक भाजपा को घेरेंगे और कांग्रेस उनके स्वर्गीय पिता सत्यदेव कटारे की विरासत है, जिसे वे किसी भी हाल में नहीं छोड़ेंगे लेकिन राजनीति के जानकारों का कहना है कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई है और सभी विकल्पों को खुला रखा गया है। शिवराज के दूसरे कार्यकाल में उपनेता प्रतिपक्ष पद रहे भिंड के ही राकेश चौधरी ने जिस तरह उपनेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा देकर पहले अपरोक्ष रूप से और फिर खुलकर भाजपा का दामन थाम लिया था, हेमंत कटारे वैसी जल्दबाजी करने के मूड में नहीं हैं, भिंड से चुनाव हारने के बाद राकेश चौधरी को अंततः कांग्रेस में वापसी करना पड़ी थी, लिहाजा अपने भविष्य के लंबे राजनीतिक कैरियर को देखते हुए कटारे “वेट एण्ड वाच” की नीति पर चल रहे हैं।

विधानसभा का महत्वपूर्ण दायित्व छोड़ने के बाद कटारे ने भाजपा विरोधी तेवर बनाए रखे हैं। वे गोमांस विवाद, इंदौर के भागीरथपुरा मामले, शंकराचार्य के अपमान और जहरीली हवा-दवा-पानी जैसे मसलों को हाउस में उठाकर भाजपा को घेरने की बात कर रहे हैं लेकिन चंबल के राजनीतिक पंडितों का कहना है कि विधानसभा चुनाव में अभी पौने तीन साल बाकी हैं, तब तक कटारे के विधानसभा क्षेत्र अटेर के समीप से बहने वाली चंबल नदी में बदलाव वाली कई नई लहरें उठ सकती हैं। अटेर भाजपा सरकार के पूर्व मंत्री अरविंद भदौरिया का पारम्परिक विधानसभा क्षेत्र है, कटारे के किसी भी नए सियासी कदम से भदौरिया के हित अहित प्रभावित होना तय है।

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