एक आदेश ने छुड़ाए अतिथियों के पसीने

अविनाश दीक्षित
अतिथि शिक्षकों पर ई-अटैंडेंस का शिकंजा कसते ही विरोध के स्वर फूटने लगे हैं। इस बार खुद नहीं बल्कि अतिथि शिक्षकों ने अपना विरोध अतिथि शिक्षक समन्वय समिति व अन्य शिक्षक संगठनों के कंधे का सहारा लेकर जताया है। मामला हाल ही में मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की नियमित उपस्थिति और शैक्षणिक व्यवस्था को सुचारू बनाने से जुड़ा है जिसमें लोक शिक्षण संचालनालय ने सख्त कदम उठाते हुए एक ऐसा आदेश निकाल दिया जिसने जबलपुर सहित प्रदेश के अन्य जिलों के अतिथि शिक्षकों के पसीने छुड़वा दिए। आदेश के मुताबिक अतिथि शिक्षक यदि लगातार सात दिनों तक अपनी ई-अटेंडेंस (ऑनलाइन उपस्थिति) दर्ज करने में विफल रहते हैं, तो उनकी सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी जाएंगी।

वहीं विभाग ने तर्क देकर स्पष्ट भी कर दिया है कि कई शिक्षक तकनीकी खामियों, नेटवर्क की समस्या या अन्य बहानों की आड़ में स्कूल से अनुपस्थित रह रहे थे। इसलिए सख्त कदम उठाया गया है जिससे बच्चों की पढ़ाई का नुकसान न हो सके। खबर है कि शिक्षक संगठनों ने लोक शिक्षण संचालनालय को चेतावनी दे डाली है कि नियमों में संशोधन नहीं किया गया तो पूरे प्रदेश भर के अतिथि शिक्षक लोकतांत्रिक तरीके से खुलकर सामने आएंगे और अपना विरोध दर्ज कराएंगे। शिक्षक संगठनों की मांग है कि सीधी सेवा समाप्ति के बजाय, आदेश में कारण बताओ नोटिस का प्रावधान अनिवार्य रूप से जोड़ा जाए। अब यह देखना होगा कि शिक्षा विभाग इस विरोध के स्वर के बीच क्या बिगुल बजाता है।

पहले क्यों नहीं फ्लैग मार्च

जबलपुर के सिहोरा में बीते दिनों भड़की हिंसा के बाद दल बल के साथ निकाले गए पुलिस फ्लैग मार्च ने क्षेत्र के लॉ एंड ऑर्डर पर प्रश्रचिह्न खड़ा कर दिया है। हिंसा के बाद हालात सामान्य नजर आने लगे हैं लेकिन सिहोरा के हर एक वाशिंदे के मुंह से ये सुना गया कि आज तक के इतिहास में सिहोरा में ऐसा पुलिस ने फ्लैग मार्च नहीं निकाला जो अब निकाला गया। विदित हो कि आजाद चौक सिहोरा में हुई दो समुदाय के लोगों में हिंसा के बाद एसपी के नेतृत्व में ये पहला फ्लैग मार्च निकाला गया जो कि चर्चाओं के बाजार में प्रमुख रहा। आम चर्चाएं थीं कि पहले से ही लचर क़ानून व्यवस्था को लेकर पुलिस अधिकारी घटना के पहले सिहोरा में मुस्तैद होते तो शायद ये हिंसा नहीं होती और कई घर नहीं जलते। उधर रस्मअदायगी के लिए सिहोरा टीआई को थाने से हटाकर क्राइम ब्रांच भेजा गया है जिसको लेकर भी तरह तरह की बातें सार्वजनिक हुईं।

इससे इतर एसडीओपी, डीएसपी अपने आप को खुशकिस्मत मान रहे हैं कि उन पर कोई कार्रवाई एसपी द्वारा सुनिश्चित नहीं की गई। दरअसल मामला दो समुदाय के बीच विवाद से जुड़ा था जिसने भोपाल तक अफसरों, मंत्रियों के खेमे में हड़कंप मचाया। लोग तो कह रहे हैं कि गनीमत है हालात दो दिन के अंदर ही काबू हो गए नहीं तो सिहोरा की हिंसा की चिंगारी कहीं जबलपुर तक पहुंचती तो मामला संभालना कठिन हो सकता था। चर्चाएं ये भी हैं कि पुलिस की मौजूदगी में सिहोरा में जिस तरह हिंसा भड़की है उससे अपराधियों, तत्वों में पुलिसिया खौफ न के बराबर है। इसकी बानगी हिंसा के दौरान स्पष्ट रूप से देखी गई। कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने तो ये तक बताया कि उपद्रव करने वालों ने पुलिस कर्मियों को भी दौड़ा दौड़ाकर डराया। सवाल ये खड़ा होता है कि जब पुलिस का रोड पर ये हाल है तो फिर आप आदमी अपने आप को कैसे महफूज समझ सकता है।

जांच शुरू करने में क्यों की देरी.. ?

जबलपुर में धान उपार्जन के दौरान हुई करोड़ों रुपए के घोटाले की प्रशासन द्वारा देरी से शुरू की गई जांच कटघरे में खड़ी होती नजर आ रही है। सवाल उठ रहे हैं कि जब घोटाले का पता लग गया था तो उसी वक्त जांच क्यों नहीं बैठाई गई? मामला ऐसे कई समूहों, समितियों और वेयरहाउस संचालकों से जुड़ा है जिन्हें प्रशासन द्वारा अधिग्रहित कर रखा गया था।
कयास लगाए जा रहे हैं कि घटिया स्तर की धान को अच्छी धान बताकर सरकारी खजाने को घोटालेबाजों ने जमकर चपत लगाई है। खबर है कि जिले में धान उपार्जन की प्रक्रिया के दौरान सिहोरा, मझौली से लेकर शहपुरा, कुंडम और जबलपुर की सीमा तक फैले सैकड़ों वेयरहाउसों में से करीब 35 को विशेष रूप से जांच के दायरे में रखा गया है।

चर्चाएं तो ये भी हैं कि जिन अधिकारियों को इन वेयरहाउसों की निगरानी के लिए तैनात किया गया था, वे ही धान माफिया के प्रभाव में आकर मूकदर्शक बने रहे। वहीं स्थानीय लोगों और किसान ये कहते भी नजर आ रहे हैं कि समय रहते कार्रवाई न होने से दोषियों को सबूत मिटाने का काफी समय मिल गया है। अब ऐसे में प्रशासन की जांच के बाद किस किस पर गाज गिरती है ये सबसे बड़ा सवाल अभी भी बनकर खड़ा हुआ है। साथ ही गोदामों में मौजूद धान का स्टॉक कागजों पर दर्ज आंकड़ों से मेल खाता है या नहीं इसके खुलासे पर भी किसानों की नजर टिकी हुई है। किसानों ने तो धान माफिया और अफसरों के गठबंधन की भी बात कही है जिसको लेकर अफसरों के खेमे में भी हड़कंप मचा हुआ है।

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