
संजय व्यास
निमाड़ की राजनीति अभी तक किसी को भी समझ नहीं आई. खंडवा जिले का पंधाना विधानसभा क्षेत्र तो सबसे विकट स्थिति बनाता है. यहां कोई भी प्रत्याशी दूसरी बार मतदाताओं ने नहीं चुना. भले ही गैप देकर लोगों ने उसे चुन लिया हो. भाजपा ही नहीं, कांग्रेस में भी यही स्थिति है. इस बार भी पंधाना की विधायक छाया मोरे के इसीलिए विधानसभा क्षेत्र बदलने की सुगबुगाहट चल रही हैं. वे मूल रूपसे रहने वाली भी खरगोन जिले के भीकनगांव क्षेत्र की हैं. इसीलिए अगला चुनाव भीकनगांव से लडऩे की जुगत में हैं. वहीं से तैयारी भी चुपचाप कर रही हैं. पंधाना का इतिहास उन्हें पता है. हालांकि छाया मोरे किस्मत लेकर चुनाव लड़ी थीं. कांग्रेस में रहते हुए विधायक बनने का सपना मुश्किल लग रहा था.
कहींं से जुगत जमाई और कांग्रेस छोडक़र भाजपा में आ गईं. कुछ ही महीनों में भाजपा के रनिंग विधायक राम दांगोरे का टिकट काटकर उन्हें भाजपा से टिकट दे दिया गया. ये वही राम दांगोरे हैं, जो इंजीनियर की पदवी रखते हैं. कम उम्र में यह विधायक बने थे। इन्होंने उस वक्त कांग्रेस से चुनाव लड़ रहीं छाया मोरे को ही परास्त किया था. ऐसी परिस्थिति के बावजूद छाया मोरे को टिकट दिया और वह विधायक भी बन गईं. हालांकि बैकग्राउंड के बड़े नेता आज भी कांग्रेस में हैं. छाया मोरे दोनों ही पार्टियों की अच्छी राजनेता बनीं. अब वे भीकनगांव की आदिवासी सीट से चुनाव की तैयारी अंदर ही अंदर कर रही हैं, ऐसी चर्चा है. ऐसा हुआ तो छाया मोरे की राजनीति उनकी मर्जी के मुताबिक सक्सेस रहेगी. पंधाना का क्या, यहां तो कोई नया विधायक भाजपा को मिल ही जाएगा. कांग्रेस के जमाने में तो, जो यहां से जीता वही मंत्री बनता था.
खुद के पांव पर कुल्हाड़ी मार रहे पाटिल!
खंडवा संसदीय सीट पर चुनाव के पहले ही बड़ी उथल-पुथल दिख रही है. कहने को यह सीट खंडवा के नाम से है, लेकिन आयातित दूसरे जिलों के नेता ही इस पर कब्जा जमाते हैं. ज्ञानेश्वर पाटिल छोटे नेता थे, स्व नंदू भैया ने उनकी किस्मत चमका दी. खुद बड़े नेता कहलाने लगे. अब यही बात दूसरे बड़े नेताओं को अखर रही है कि उनसे बड़ा वजूद इनका कैसे हो गया? बड़ी प्लानिंग से इसी रणनीति ने दो गुट बना दिए. इनको लीड एक बड़ी नेत्री कर रही हैं. खंडवा के दो विधायकों के टिकट काटे थे. बुरहानपुर में भी ऐसा ही खेल रचा था. वह भी अब इनके खिलाफ खुलकर उतर गए हैं. इतना ही नहीं, खंडवा और बुरहानपुर के नगर निगम चुनाव में भी उनकी खिलाफत वाले कुर्सी पा गए.
खंडवा और बुरहानपुर में भी जिला अध्यक्ष की कुर्सी पर इनकी मुखालफत के बावजूद दूसरे ही बैठ गए. मतलब साफ समझ में आ रहा है कि वर्तमान सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल की जमावट भविष्य में अपनी ही कुर्सी के लिए घातक सिद्ध हो सकती है. ऐसे में उनके बढ़ते विरोधी इन्हें टिकट मिलने में बाधक बन सकते हैं? खंडवा और बुरहानपुर जिले के अलावा खरगोन व देवास जिले के नेता भी उनकी खिलाफत में उतर गए हैं. चार जिलों के कुछ क्षेत्र में खंडवा लोकसभा क्षेत्र आता है. बड़ा एरिया भी ज्ञानेश्वर पाटिल कवर नहीं कर पाएंगे. नंदू भैया की जमी जमाई फील्डिंग से इन्होंने पिछली बार भले ही मैच जीत लिया हो, इस बार डगर कठिन रहेगी, क्योंकि खंडवा के दो कॉलोनी काटने वाले लोग बोरों में पैसा रखकर राजनीति करने के मूड में हैं.
वरिष्ठ पार्षद पद पर नियुक्ति का इंतजार
झाबुआ जिला भाजपा में कार्यकर्ताओं को राजनीतिक नियुक्तियों के द्वार खुलने से अब अपना नंबर आने की आस वंध गई है. विगत कुछ समय में जिला भाजपा के कई कार्यकर्ताओं को विभिन्न मोर्चों और प्रकोष्ठों में पदाधिकारी बनाया जा रहा है. प्रदेश भाजपा द्वारा अपनी टीम में थांदला की महिला नेत्री को प्रदेश मंत्री बनाकर नवाजा गया तो दूसरी ओर अनुसूचित जनजाति मोर्चा में प्रदेश मंत्री के रूप में पूर्व जिला महामंत्री सोम सिंह सोलंकी को प्रदेश मंत्री, कल्याण सिंह डामोर को इसी मोर्चे का प्रशिक्षण वर्ग प्रभारी बनाया गया है. तीन सदस्यों को प्रदेश कार्यकारिणी में स्थान दिया गया है. अजमेर सिंह भूरिया, बहादुर एटीला और रामपाल सिंह चौहान को प्रदेश कार्य समिति में शामिल किया गया. अब कार्यकर्ताओं को जिले की एक नगर पालिका और चार नगर पंचायत में वरिष्ठ पार्षद पद पर नियुक्ति का इंतजार है.
