गोरखपुर | राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ‘कुटुंब स्नेह मिलन’ कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने परिवार की महत्ता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि परिवारों का साथ न मिलता, तो संघ का अस्तित्व संभव नहीं था। भागवत के अनुसार, संघ को समझने के लिए उसके स्वयंसेवकों के परिवारों के आचरण को देखना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल एक छत और चारदीवारी से परिवार नहीं बनता, बल्कि वह अपनत्व और रिश्तों की एक ऐसी इकाई है जहाँ अगली पीढ़ी को सामाजिक बनने का पहला प्रशिक्षण मिलता है।
संघ प्रमुख ने स्वयंसेवकों को समाज से पांच कदम आगे रहने का आह्वान करते हुए कहा कि ‘पंच परिवर्तन’ केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे अपने व्यक्तिगत आचरण में उतारना होगा। उन्होंने कहा कि समाज तब बदलता है जब वह किसी गृहस्थ के आदर्श कार्यों को देखता है। भागवत ने परिवारों से विषमताओं से ऊपर उठने और रोटी, कपड़ा, मकान जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के साथ-साथ अतिथि सत्कार और संस्कारयुक्त जीवन जीने का आग्रह किया, ताकि एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण हो सके।
अपने संबोधन में डॉ. मोहन भागवत ने माता को कुटुंब का केंद्र बताया और कहा कि सामाजिक शिक्षा एवं संस्कृति के हस्तांतरण का मुख्य स्रोत परिवार ही है। उन्होंने पर्यावरण की चिंता अपने घर से शुरू करने, घरों में महापुरुषों के चित्र लगाने और स्वदेशी वस्तुओं के अधिकतम प्रयोग पर बल दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि साल में कम से कम 2-3 बार कुटुंब मिलन कार्यक्रम होने चाहिए, जिससे सामाजिक परिवर्तन की गति तेज हो सके। इस कार्यक्रम में गोरखपुर प्रांत के हजारों कार्यकर्ता अपने परिवारों के साथ सम्मिलित हुए।

