नयी दिल्ली 16 फरवरी (वार्ता) राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सोमवार को कहा कि ओल चिकी लिपि दुनिया भर में संथाल समुदाय की पहचान का सशक्त प्रतीक है।
श्रीमती मुर्मु ने आज यहां इस लिपि के शताब्दी समारोह का उद्घाटन किया । समारोह का आयोजन संस्कृति मंत्रालय ने किया था। राष्ट्रपति ने कहा कि संथाल समुदाय की अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति है , हालांकि अपनी लिपि न होने के कारण, संथाली भाषा को प्रारंभ में रोमन, देवनागरी, उड़िया और बंगाली लिपियों में लिखा जाता था। नेपाल, भूटान और मॉरिशस में रहने वाले संथाल समुदाय के लोग भी उन देशों में प्रचलित लिपियों का उपयोग करते थे। ये लिपियाँ संथाली भाषा के मूल शब्दों का सही उच्चारण नहीं कर पाती थीं।
उन्होंने कहा कि 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मु ने ओल चिकी लिपि का आविष्कार किया। इसके बाद से यह लिपि संथाली भाषा में प्रयोग हो रही है। आज यह लिपि विश्वभर में संथाल समुदाय की पहचान का एक सशक्त प्रतीक बन गई है। यह संथाल समुदाय में एकता स्थापित करने का भी प्रभावशाली माध्यम है। राष्ट्रपति ने कहा कि ओल चिकी के शताब्दी समारोह इस लिपि के प्रचार-प्रसार के लिए संकल्प लेने का अवसर होना चाहिए। बच्चों को हिंदी, अंग्रेज़ी, उड़िया, बंगाली या किसी अन्य भाषा में शिक्षा मिल सकती है, लेकिन उन्हें अपनी मातृभाषा संथाली को ओल चिकी लिपि में भी सीखना चाहिए।
राष्ट्रपति ने इस बात की सराहना की की कि कई लेखक अपने कार्यों के माध्यम से संथाली साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। उन्होंने उन्हें लोगों को अपने लेखन के माध्यम से जागरूक करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि भारत कई भाषाओं का बाग़ है। भाषा और साहित्य ही समुदायों में एकता बनाए रखने वाले धागे हैं। साहित्य का आदान-प्रदान भाषाओं को समृद्ध कर सकता है। संथाली साहित्य का अनुवाद और लेखन के माध्यम से अन्य भाषाओं के छात्रों के लिए सुलभ बनाने तथा इसी तरह अन्य भाषाओं के साहित्य को भी संथाली में पहुंचाए जाने के प्रयास किए जाने चाहिए। राष्ट्रपति ने ओल चिकी के 100 वर्ष पूरे होने पर एक स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किया। उन्होंने संथाली समुदाय के 10 ऐसे व्यक्तियों को भी सम्मानित किया जिन्होंने संथाली लोगों में ओल चिकी लिपि के व्यापक उपयोग को बढ़ावा देने में योगदान दिया।

