
ग्वालियर। जीवाजी विश्वविद्यालय के गालव सभागार में शुक्रवार को 5 दिवसीय अखिल भारतीय महाकवि भवभूति समारोह का भव्य शुभारम्भ हुआ। कार्यक्रम का आरम्भ मां सरस्वती एवं महाकवि भवभूति के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। उद्घाटन सत्र में साहित्य, संस्कृत और शिक्षा जगत की विशिष्ट हस्तियों की उपस्थिति रही।
उद्घाटन सत्र की मुख्य अतिथि के.आर.जी. कॉलेज की पूर्व प्राध्यापक डॉ. कृष्णा जैन ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, दर्शन और नैतिक मूल्यों की संवाहक है। उन्होंने महाकवि भवभूति की रचनाओं को मानवीय संवेदनाओं और कर्तव्यबोध का अद्वितीय उदाहरण बताते हुए युवाओं से शास्त्रीय साहित्य को आधुनिक दृष्टि से समझने का आह्वान किया। सारस्वत अतिथि शासकीय संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. मनीष खेमरिया ने भवभूति की प्रमुख कृतियों महावीरचरित, मालती-माधव और उत्तर रामचरित का उल्लेख करते हुए कहा कि भवभूति ने संस्कृत नाट्य परंपरा को करुण रस की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। विशेष रूप से ‘उत्तररामचरित’ में राम द्वारा सीता के परित्याग के प्रसंग को उन्होंने मानवीय अंतर्द्वंद्व, राजधर्म और व्यक्तिगत वेदना के संतुलन के रूप में प्रस्तुत किया है। यह प्रसंग केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि एक शासक की नैतिक पीड़ा का मार्मिक चित्रण है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाकवि भवभूति शोध एवं शिक्षा समिति के उपाध्यक्ष डॉ. विष्णु नारायण तिवारी ने पांच दिवसीय आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत की और बताया कि समारोह के अंतर्गत विभिन्न साहित्यिक, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। उन्होंने कहा कि यह आयोजन भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्स्मरण और युवाओं में साहित्यिक चेतना के संवर्धन का प्रयास है।
विशिष्ट अतिथि के.आर.जी. कॉलेज के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. उमंग सिंह तोमर ने संस्कृत साहित्य में भवभूति के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि उनकी रचनाएं मनोवैज्ञानिक गहराई और भावनात्मक तीव्रता से परिपूर्ण हैं।
पूर्व संस्कृत शिक्षक डॉ. ब्रह्मदेव आर्य ने कहा कि भवभूति का साहित्य समाज को नैतिक दिशा प्रदान करता है और आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है।
*भवभूति का साहित्यिक योगदान*
महाकवि एवं नाटककार भवभूति संस्कृत साहित्य के प्रमुख स्तंभों में माने जाते हैं। उनकी रचनाओं में करुण रस की प्रधानता, पात्रों की मनोवैज्ञानिक गहराई और मानवीय संवेदनाओं का प्रभावशाली चित्रण देखने को मिलता है।
‘उत्तररामचरित’ में राम के अंतर्द्वंद्व और सीता परित्याग के प्रसंग को जिस मार्मिकता से प्रस्तुत किया गया है, वह संस्कृत नाट्य साहित्य में विशिष्ट स्थान रखता है। भवभूति ने देवत्व से परे पात्रों को मानवीय धरातल पर स्थापित कर उन्हें जीवंत बनाया।
*अंतर्विद्यालयीन प्रतियोगिताओं में प्रतिभा का प्रदर्शन*
उद्घाटन सत्र के पश्चात आयोजित अंतर्विद्यालयीन प्रतियोगिताओं में ग्वालियर के विभिन्न विद्यालयों के लगभग 100 छात्र-छात्राओं ने सहभागिता की। प्रतियोगिताओं के निर्णायक मंडल में डॉ. अशोक विश्नोई, डॉ. नरोत्तम निर्मल, डॉ. नरोत्तम त्रिपाठी, डॉ. गोतम सिंह एवं डॉ. गिर्राज गुप्ता उपस्थित रहे।
*ये रहे प्रतियोगिता के परिणाम*
1- सस्वर श्लोक पाठ प्रतियोगिता : मंत्रिता शर्मा प्रथम, मिशिका राज द्वितीय, अपर्णा सिंह तृतीय
2- संस्कृत भाषण प्रतियोगिता : नियति गोयल प्रथम, परिधि अग्रवाल द्वितीय, आराधना रावत तृतीय
3- हिन्दी भाषण प्रतियोगिता : तृषा गोयल प्रथम, शौर्य सिंह द्वितीय, स्नेहा गुर्जर तृतीय
4- हिन्दी वाद-विवाद प्रतियोगिता : श्रुति चतुर्वेदी प्रथम, अवनि मित्तल द्वितीय, युवराज ठाकुर तृतीय
5- संस्कृत निबन्ध लेखन प्रतियोगिता : मानवी प्रथम, निशांत ठाकुर द्वितीय, अर्शिका सिंह जादौन तृतीय
*इनकी रही मौजूदगी*
कार्यक्रम का संचालन एमएलबी हायर सेकेंडरी स्कूल की शिक्षिका डॉ. काजल सक्सैना ने तथा आभार प्रदर्शन डॉ. विकास शुक्ला द्वारा किया गया। इस अवसर पर ग्वालियर संभाग के विभिन्न विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के शिक्षक डॉ. अंजना कुमारी चौहान, वंदना शर्मा, आनंद पाठक, अवनि सिंह, एकात्मता शर्मा तथा छात्र छात्राओं में अनामिका मित्तल, अंजलि रजक, मुस्कान राठौर, शालिनी मित्तल, तृषा गोयल, याशी मित्तल, अन्वी सिंह, स्नेहा शर्मा, मोहित रावत, रिदा आलमखान, पलक खान सहित अनेक लोग उपस्थित रहे। पांच दिवसीय यह समारोह न केवल महाकवि भवभूति के साहित्य का पुनर्स्मरण है, बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने की दिशा में एक सार्थक पहल भी सिद्ध हो रहा है।
*संस्कृत साहित्य और भवभूति पर युवा दृष्टिकोण*
समारोह में शामिल विद्यार्थियों ने भी संस्कृत साहित्य और महाकवि भवभूति के योगदान पर विचार व्यक्त किए।
कक्षा 12 की छात्रा अनामिका मित्तल (हायर सेकेंडरी स्कूल, मुरार) ने कहा कि संस्कृत साहित्य भारतीय संस्कृति की जड़ है। वेद, उपनिषद और महाकाव्य हमारी पहचान हैं। उन्होंने कहा कि भवभूति जैसे नाटककारों ने अपने साहित्य के माध्यम से भारतीय जीवन मूल्यों और आदर्शों को सशक्त रूप से प्रस्तुत किया है।
शालिनी मित्तल (कक्षा 12) ने कहा कि संस्कृत केवल प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि ज्ञान-विज्ञान, दर्शन और नैतिकता की आधारशिला है। उन्होंने ‘उत्तररामचरित’ का उल्लेख करते हुए कहा कि भवभूति ने राम और सीता के जीवन को मानवीय दृष्टि से प्रस्तुत कर साहित्य को संवेदनशील आयाम दिया।
रेडिएंट स्कूल के छात्र मोहित रावत कक्षा 9 ने कहा कि संस्कृत साहित्य भारतीय सभ्यता की आत्मा है। भवभूति ने अपने नाटकों में करुण रस के माध्यम से यह दिखाया कि एक शासक भी भावनाओं से जुड़ा मानव होता है। राम द्वारा सीता के परित्याग का प्रसंग समाज, कर्तव्य और व्यक्तिगत जीवन के संघर्ष को दर्शाता है।
सिंधिया स्कूल, ग्वालियर की कक्षा 9 की छात्रा तृषा गोयल ने कहा कि संस्कृत साहित्य हमें नैतिक शिक्षा और संस्कार देता है। उन्होंने कहा कि भवभूति की रचनाएं हमें यह सिखाती हैं कि जीवन में संवेदनशीलता और कर्तव्य दोनों का संतुलन आवश्यक है।
याशी मित्तल ने कहा कि संस्कृत साहित्य में भारतीय संस्कृति, परंपरा और इतिहास का समग्र चित्रण मिलता है। भवभूति ने अपने नाटकों के माध्यम से भावनात्मक गहराई और चरित्रों की मनोवैज्ञानिक प्रस्तुति को नया आयाम दिया।
अन्वी सिंह ने कहा कि भवभूति का साहित्य आज भी प्रासंगिक है क्योंकि उसमें मानवीय संवेदनाएं और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश मिलता है। इस तरह विद्यार्थियों के विचारों ने यह स्पष्ट किया कि संस्कृत साहित्य और महाकवि भवभूति की रचनाएं आज की युवा पीढ़ी को भी प्रेरित कर रही हैं और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ रही हैं।
