जेयू में चल रही भारतीय इतिहास में भारतीय ज्ञान परंपरा पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

ग्वालियर। भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है, जहां धर्म और अध्यात्म की परंपराएं अनेक आघातों के बावजूद आज भी जीवित हैं। चाहे चिकित्सा विज्ञान हो, खगोल विज्ञान या गणित भारत प्राचीन काल से ही इन क्षेत्रों में उन्नत रहा है। यह बात भारतीय इतिहास अनुशंसान परिषद, नई दिल्ली के सदस्य सचिव डॉ. ओमजी उपाध्याय ने कही। वे जीवाजी विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला तथा नोडल केन्द्र भारतीय ज्ञान परम्परा के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय इतिहास में भारतीय ज्ञान परम्परा विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि की आंसदी से बोल रहे थे। अध्यक्षता जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राजकुमार आचार्य ने की। विशिष्ट अतिथि काश फाउंडेशन मुंबई के संस्थापक डॉ. अवकाश जाधव, जेयू कुलसचिव डॉ. राजीव मिश्रा एवं आयोजन सचिव डॉ. शांतिदेव सिसोदिया मंचासीन रहे।

स्वागत भाषण देते हुए विभागाध्यक्ष डॉ. शांतिदेव सिसोदया ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शक है। डॉ. अवकाश जाधव ने में कहा कि जो गुरु होता है, वह जीवन भर सीखता रहता है। उन्होंने कहा कि जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही फल प्राप्त होता है, इसलिए हमें अपने ज्ञान और संस्कारों की जड़ों को समझना और सशक्त करना होगा। भारतीय ज्ञान परम्परा विश्व की प्राचीनतम, निरंतर और समग्र ज्ञान प्रणालियों में से एक है। यह केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन दर्शन, विज्ञान, कला, नैतिकता और आध्यात्मिक चेतना का समन्वय है। इसकी जड़ें वैदिक काल में हैं और यह परम्परा आज भी जीवित है।

कुलगुरु डॉ. राजकुमार आचार्य ने कहा कि समय के साथ ज्ञान परंपरा का स्वरूप बदला है, जो परिवेश के परिवर्तन का परिणाम है।

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