रामघाट पर परंपरा से टकराएगा प्रोजेक्ट, घाट की घंटियों में घुला टेंडर का शोर

उज्जैन. शहर को स्मार्ट बनाने के दावे कितनी हद तक हकीकत में बदल पाए है, इसकी समीक्षा होना तो अभी बाकी है. बावजूद इसके एक और प्रकल्प शुरू करने की कवायद प्रारंभ कर दी गई है, जिसके अंतर्गत रामघाट पर प्रतिदिन होने वाली क्षिप्रा आरती भी अब स्मार्ट सिटी द्वारा संचालित की जाएगी,इसके लिए टेंडर निकाला है.

 

दरअसल स्मार्ट सिटी ने रामघाट पर होने वाली क्षिप्रा आरती का टेंडर निकाला है,गंगा आरती की तर्ज पर ये आरती किसी बड़ी निजी फर्म से कराई जाएगी, जिस कंपनी का टर्न ओवर 1 करोड़ हो, जिसने धार्मिक कार्य किए हो, जो प्रतिमाह 18 लाख खर्च कर सकता हो ऐसी फर्म आरती का टेंडर ले सकती है, जिसकी अंतिम तिथि 16 फरवरी है. वर्तमान में रामघाट क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर स्थानीय धार्मिक संस्थाओं, नवयुवक मंडलों व श्री क्षेत्र पंडा समिति द्वारा नियमित रूप से आरती का आयोजन किया जा रहा है. ऐसे में स्मार्ट सिटी द्वारा इस धार्मिक प्रकल्प में रुचि लेने के पीछे क्या मक¸सद है इस पर नई बहस छिड़ गई है.

 

टकराव की स्थिति

स्थानीय लोगों के अनुसार राणो जी की छत्री,श्री क्षेत्र व अन्य समितियों द्वारा वर्षों से आरती का आयोजन किया जा रहा है. इन आयोजनों में श्रद्धालुओं की भागीदारी के साथ-साथ पर्याप्त मात्रा में चढ़ावा भी आता है, जिसके माध्यम से दीप, धूप, सफाई, प्रकाश व्यवस्था और अन्य व्यवस्थाएँ स्वयं स्थानीय समूहों द्वारा संचालित की जाती हैं. ऐसे में स्मार्ट सिटी द्वारा व्यवसाईक तौर पर आरती का ठेका देने की प्रक्रिया से टकराव की नौबत आ गई है.

 

स्पष्ट नीति का अभाव

क्षिप्रा के घाट पर आरती को ठेके पर देने की निविदा के दस्तावेज़ में चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश न होने से असमंजस की स्थिति बन रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक आयोजनों में चढ़ावा केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि व्यवस्था संचालन का एक महत्वपूर्ण आधार भी होता है. ऐसे में यदि नई एजेंसी और मौजूदा समितियों के अधिकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया, तो विवाद की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

 

स्थानीय सहभागिता पर भी उठे सवाल

शहर के धार्मिक और सामाजिक संगठनों का कहना है कि माँ क्षिप्रा आरती जैसे आयोजन में स्थानीय समितियों और पारंपरिक व्यवस्थाओं की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. उनका सुझाव है कि नई व्यवस्था लागू करने से पहले सभी संबंधित पक्षों के साथ स्पष्ट संवाद, भूमिका निर्धारण और सहमति आवश्यक है.

 

प्रशासन से स्पष्टता की अपेक्षा

निविदा जारी होने के बाद अब प्रशासन से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह स्पष्ट करे कि मौजूदा आरतियों का स्वरूप क्या रहेगा, नई एजेंसी की भूमिका किन सीमाओं तक होगी और चढ़ावे व व्यवस्थाओं का संतुलन किस प्रकार बनाया जाएगा.

 

भव्यता के साथ दिव्यता हो

नवभारत से चर्चा में घाट के पंडो ने बताया कि स्मार्ट सिटी को क्षिप्रा आरती को इस तरह व्यवसायिक क्यों बनाया जा रहा है, ये चिंता का विषय भी है. स्मार्ट सिटी शहर विकास के काम संभाले. रही बात आरती की तो हम इस कार्य मे परम्परा अनुसार यह धर्म कार्य करते आए है. माँ क्षिप्रा आरती को अधिक व्यवस्थित बनाने और दिव्य बनाने का कर्तव्य सबको निभाना चाहिए, भव्य बनाने के उद्देश्य से लाई गई. यह ठेके की पहल तभी सफल मानी जाएगी, जब उसमें परंपरा, स्थानीय सहभागिता और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके.

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