
सिंगरौली। एनसीएल अमलोरी परियोजना से आई यह खबर न सिर्फ झकझोर देने वाली है, बल्कि जिले की कानून-व्यवस्था पर एक करारा तमाचा भी है। 18 जनवरी की रात गश्त के दौरान बेरहमी से हमला झेलने वाला सीआईएसएफ का जवान आखिरकार इलाज के 12वें दिन वाराणसी में दम तोड़ दिया।
इस घटना ने पूरे जिले में आक्रोश, शोक और गुस्से की लहर दौड़ा दी है। सवाल अब सिर्फ एक जवान की मौत का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का है, जिसने कबाड़ माफिया को इस कदर बेखौफ बना दिया कि वे सुरक्षा बल के जवान को पीट-पीटकर अधमरा कर झाड़ियों में फेंक देते हैं। गौरतलब है कि मुताबिक नवानगर थाना क्षेत्र अंतर्गत एनसीएल अमलोरी खदान में सीआईएसएफ जवान 18 जनवरी की रात नियमित गश्त पर था। तभी अज्ञात कबाड़ गिरोह के सदस्यों ने अचानक हमला बोल दिया। जवान को पीठ, सिर पर लगातार डंडों से पीटा गया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। हमलावर उसे मरणासन्न हालत में झाड़ियों में फेंक कर फरार हो गए। काफी देर बाद जवान को ढूंढा गया और पहले नेहरू चिकित्सालय जयंत में प्राथमिक उपचार दिया गया, जहां से हालत गंभीर होने पर उसे वाराणसी रेफर किया गया। तमाम प्रयासों के बावजूद शुक्रवार को इलाज के दौरान जवान ने दम तोड़ दिया। इस मौत के साथ ही पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है। क्षेत्र में खुलेआम यह आरोप लग रहे हैं कि कबाड़ माफिया के हौसले यूं ही बुलंद नहीं हैं, बल्कि कहीं न कहीं उन्हें संरक्षण भी प्राप्त है। जिस तरह से सीआईएसएफ जवान पर सुनियोजित हमला किया गया, उसने पुलिस के तमाम दावों की पोल खोल दी है। लोग खुलकर कहने लगे हैं कि अगर पुलिस वास्तव में सख्त होती, तो कबाड़ी सुरक्षा बल पर हमला करने की हिम्मत नहीं करते।
कबाड़ गिरोह खदानों में हैं सक्रिय
स्थानीय जानकारों का कहना है कि वर्ष 2013-14 में तत्कालीन एसपी जयदेव ने अवैध कारोबारियों पर सख्त नकेल कसी थी, जिसका असर साफ दिखाई देता था। लेकिन उसके बाद से कोई भी पुलिस अधिकारी अवैध कबाड़ कारोबार पर वैसी प्रभावी कार्रवाई नहीं कर सका। खासकर विस चुनाव के बाद से अवैध कारोबारियों की जैसे चांदी ही कट गई हो। खुलेआम कबाड़ की तस्करी, चोरी और हिंसा की घटनाएं सामने आ रही हैं, लेकिन ठोस कार्रवाई नदारद है। पुलिस अधिकारी चाहे जितना दावा कर लें कि जिले में कानून-व्यवस्था बेहतर है, लेकिन बैढ़न जोन में सीआईएसएफ जवान की हत्या इन दावों को हवा-हवाई साबित करती है। अगर सुरक्षा बल का जवान ही सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक की सुरक्षा का क्या भरोसा, यही सवाल अब हर गली-चौराहे पर पूछा जा रहा है।
