हाईकोर्ट सख्त: भगीरथपुरा मामले की जांच को सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में आयोग गठित

इंदौर:भगीरथपुरा इलाके में दूषित पेयजल आपूर्ति से हुई मौतों और फैली बीमारियों के मामले को गंभीर जनस्वास्थ्य आपात मानते हुए हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वच्छ पेयजल नागरिकों के जीवन के अधिकार का हिस्सा है और इस अधिकार के उल्लंघन के आरोपों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय जांच आवश्यक है. इसी के चलते अदालत ने पूरे मामले की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग गठित करने के आदेश दिए हैं.

मामला भगीरथपुरा क्षेत्र सहित इंदौर के अन्य हिस्सों में दूषित पानी की आपूर्ति से जुड़े जनहित याचिकाओं और व्यक्तिगत याचिकाओं से संबंधित है. याचिकाओं में प्रशासन पर लापरवाही, कुप्रबंधन और भ्रष्ट रवैये के आरोप लगाए गए थे, जिनके कारण बच्चों और बुजुर्गों सहित बड़ी संख्या में लोग बीमार हुए और मौतें होने की बात सामने आई. हाईकोर्ट ने कहा कि यह केवल इंदौर का नहीं बल्कि पूरे प्रदेश का मुद्दा है. इसी कारण अदालत ने पहले ही राज्य के मुख्य सचिव को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जवाब देने के निर्देश दिए थे.

राज्य सरकार और नगर निगम ने अदालत में अनुपालन रिपोर्ट पेश कर दावा किया कि सुरक्षित पानी की आपूर्ति, इलाज और जांच के निर्देशों का पालन किया जा रहा है तथा एक उच्च स्तरीय समिति गठित की गई है. हालांकि याचिकाकर्ताओं ने इन रिपोर्टों को जमीनी हकीकत से परे बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया. उनका कहना था कि प्रभावित इलाकों में अब भी सुरक्षित पानी, मुफ्त इलाज और जांच के निर्देशों का पूर्ण पालन नहीं हो रहा है.

याचिकाकर्ताओं ने मीडिया रिपोर्ट और स्थानीय निवासियों के आवेदन पेश करते हुए आरोप लगाया कि तथाकथित उच्च स्तरीय समिति जिम्मेदार अधिकारियों को बचाने का प्रयास है. मौतों के आंकड़ों को लेकर भी अदालत में तीखी बहस हुई. याचिकाकर्ताओं और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दूषित पानी से करीब 30 लोगों की मौत हुई, जबकि राज्य सरकार द्वारा पेश डेथ ऑडिट रिपोर्ट में 23 मौतों में से केवल 16 को ही जलजनित महामारी से जोड़कर बताया गया.

शेष मौतों को ‘संभावना अस्पष्ट’ बताया गया, लेकिन अदालत ने इस आधार और रिकॉर्ड पर गंभीर सवाल खड़े किए. अदालत ने यहां तक कहा कि सरकार यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि रिपोर्ट में इस्तेमाल की गई ‘वर्बल ऑटोप्सी’ का वास्तविक आधार क्या है. इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने माना कि मामला स्वतंत्र जांच के बिना स्पष्ट नहीं हो सकता और रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता को एकल जांच आयोग नियुक्त किया है.

जांच आयोग भगीरथपुरा में दूषित पानी की आपूर्ति के कारण, सीवेज या अन्य स्रोतों से हुए प्रदूषण, पाइपलाइन लीकेज, जलजनित बीमारियों की प्रकृति, वास्तविक मौतों की संख्या, चिकित्सा व्यवस्था की पर्याप्तता, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका और पीड़ितों को मुआवजा दिए जाने के दिशा-निर्देशों की जांच करेगा. आयोग को सिविल कोर्ट के समान अधिकार दिए गए हैं, जिसमें अधिकारियों और गवाहों को तलब करना, रिकॉर्ड मंगवाना, मौके का निरीक्षण करना और मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं से पानी की जांच कराना शामिल है.

अदालत ने राज्य सरकार, जिला प्रशासन, नगर निगम, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को आयोग को पूरा सहयोग देने के निर्देश दिए हैं. साथ ही राज्य सरकार को आयोग के लिए कार्यालय, स्टाफ और अन्य संसाधन उपलब्ध कराने के आदेश भी दिए हैं. हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि प्रभावित इलाकों में प्रतिदिन पानी की गुणवत्ता की जांच की जाए और नियमित स्वास्थ्य शिविर लगाए जाएं. जांच आयोग को चार सप्ताह के भीतर अंतरिम रिपोर्ट पेश करनी होगी. मामले की अगली सुनवाई 5 मार्च 2026 को तय की गई है

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