धारों से तीन साल में आठ प्रतिशत तक पहुंच सकती है विकास दर: डॉ नागेश्वरन

नयी दिल्ली, 29 जनवरी (वार्ता) मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने गुरुवार को कहा कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वार्षिक वृद्धि दर की संभावनाओं को नीतियों और प्रक्रियाओं में सुधारों के माध्यम से दो-तीन वर्ष के अंदर ही साढ़े सात-आठ प्रतिशत के स्तर तक पहुंचाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि पिछले तीन वर्ष में जीडीपी वृद्धि दर की संभावनाएं 6.5 प्रतिशत वार्षिक से बढ़कर इस समय सात प्रतिशत हो गयी है। इसके आधार पर ही वित्त वर्ष 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण में आगमी वित्त वर्ष 2026-27 में आर्थिक वृद्धि के 6.8 से 7.2 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान लगाया गया है। यह औसतन सात प्रतिशत के स्तर का अनुमान है। उल्लेखनीय है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में आज रखी गयी आर्थिक सर्वे रिपोर्ट में चालू वित्त वर्ष की जीडीपी वृद्धि सात प्रतिशत से ऊपर रहने का अनुमान है। डॉ. नागेश्वरन ने कहा कि भू-राजनीतिक परिस्थितियों और अन्य वाह्य कारणों से कोई बड़ी चुनौती न उत्पन्न हुई तो चालू वित्त वर्ष की वृद्धि सात प्रतिशत के दायरे में रहेगी। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के इसी माह के शुरू में प्रस्तुत प्रथम अग्रिम अनुमानों में वित्त वर्ष 2025-26 में वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत के स्तर पर रखा गया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा, “अमेरिका के साथ व्यापार समझौता हुआ तो सात प्रतिशत के स्तर की वृद्धि दर में सहायता मिलेगी। उन्होंने कहा, “भूमि और अन्य क्षेत्रों में सुधारों के माध्यम से देश की संभावित जीडीपी वृद्धि दर को तीन साल के अंदर 7.5 प्रतिशत से 8.0 प्रतिशत के स्तर पर ले जाया जा सकता है।”

डॉ नागेश्वरन ने आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 की प्रस्तावना में कहा है कि वैश्विक चुनौतियों और अमेरिका में भारतीय माल के खिलाफ ऊंचे शुल्क के बावजूद आर्थिक वृद्धि में जो सुधार आया है वह “एक के बाद एक कई बुनियादी सुधारों और नीतिगत उपायों के चलते आयी है”। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने लिखा है कि अगस्त में अमेरिका ने उसके ऊपर भारत से वहां जाने वाली अधिकांश वस्तुओं पर 25 प्रतिशत का एक और दंडात्मक सीमा शुल्क लगाने की घोषणा की, तो इससे कई लोग चौंक गये। उल्लेखनीय है कि उसके बाद कई एजेंसियों ने भारत के वृद्धि के अनुमान से कम कर दिया था। बाद में उन्होंने भारत की असंरचनात्मक शक्ति सुधारों के मद्देनजर उसमें सुधार कर दिया है। डॉ नागेश्वरन ने संवाददाता सम्मेलन में अपनी प्रस्तुति में कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की भविष्य की संभावनाएं उज्ज्वल है। उन्होंने वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में स्वदेशी को एक न्यायसंगत उपाय की संज्ञा दी, लेकिन यह भी कहा कि देश की आर्थिक वृद्धि बढ़ने पर देश का आयात भी बढ़ना स्वाभाविक है। उन्होंने प्रतिस्पर्धी लागत के विनिर्माण और वस्तु निर्यात में वृद्धि को प्रोत्साहित किये जाने की जरूरत बल देते हुए “दम ज्यादा , दाम कम” के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले से दिये गये नारे को बहुत समीचीन बताया। उन्होंने राजकोषीय स्थिति और बैंकों की बैलेंसशीट की मजबूती तथा गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में तीव्र सुधार का उल्लेख किया। उन्होंने राजकोषीय घाटे और चालू खाते के घाटे की स्थिति में सुधार का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार आज एक साल के आयात के लिए पर्याप्त है। लेकिन उन्होंने राज्यों के स्तर पर वित्तीय अनुशासन में सुधार की जरूरत पर विशेष बल दिया।

रुपये की गिरावट के बारे में उन्होंने कहा कि लम्बी अवधि में देखें तो भारतीय रुपये का प्रदर्शन कहीं से भी बुरा नहीं दिखेगा। उन्होंने पिछले कुछ समय से रुपये की विनिमय दर में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले छह-सात प्रतिशत की गिरावट के लिए ‘पूंजी आयात’ पर भारत की शुद्ध निर्भरता और अमेरिकी आयात शुल्क जैसे कारकों को जिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा कि यह भारत के वृहद आर्थिक संकेतकों की स्थिति के कारण नहीं बल्कि बाहरी परिस्थितियों का परिणाम दिखती है। उन्होंने कहा कि हम पूंजी के आयातक हैं चालू वित्त में सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में 10 प्रतिशत की वार्षिक दर से वृद्धि दिखी है लेकिन शुद्ध एफडीआई गिरा है, ऐसा संभवत: पुराने निवेश का लाभ निकालने के लिए की गयी बिक्री और भारत से विदेशों में किये गये प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (ओडीआई) के साथ-साथ अमेरिकी शुल्कों के चलते विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (पीएफआई) की निकासी का मिलाजुला असर हो सकता है। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने लिखा है, “भारत अपने भुगतान संतुलन की स्थिति को मजबूत रखने के लिए विदेशी पूंजी प्रवाह पर निर्भर करता है। जब ये प्रवाह कम हो जाते हैं, तो रुपये की स्थिरता खतरे में पड़ जाती है।”उन्होंने आने वाले समय के लिए तीन परिदृश्यों की कल्पना करते हुए कहा कि भू-राजनीतिक परिस्थितियों और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार संबंधों के मोर्चे पर परिस्थितियां नहीं बिगड़ी तो आने वाला वर्ष “व्यवस्थित अव्यवस्था” का होगा और परिस्थितियां “कमोबेश ऐसी ही” बनी रहेंगी। दूसरी कल्पना ऐसी स्थिति की है जहां वैश्विक स्तर पर जवाबी कार्रवाइयां शुरू हो सकती हैं। ऐसे में हालात बिगड़ेंगे। उन्होंने इन दो के अलावा एक ऐसी स्थिति की परिकल्पना की है जो एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) जैसे क्षेत्र में कंपनियों के ऊंचे मूल्यांकन में गिरावट से शुरू हो सकती है। उस स्थिति में परिणाम 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट जैसे हो सकते हैं।

डॉ नागेश्वरन ने सर्वेक्षण की प्रस्तावना में लिखा है, “आइए, कुछ देर के लिए इस संभावना पर ध्यान दें कि वित्तीय दबाव की मामले बहुत हल्के बचावों की गुंजाइश के साथ एक देश से दूसरे देश में फैल रहे हैं। क्रिसमस 2025 की पूर्व संध्या पर, अखबार फाइनेंशियल टाइम्स ने लिखा, “प्रौद्योगिकी कंपनियों ने वॉल स्ट्रीट निवेशकों के वित्तपोषण से बनायी गयी विशेष प्रयोजन कंपनियों (एसपीवी) का इस्तेमाल करके 120 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश डेटा सेंटरों पर खर्च किया है जो इन कंपनियों के लेखा-जोखा में नहीं दिखता। इससे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पर उनके बड़े दांव के वित्तीय जोखिमों को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।”
इसी में उन्होंने अमेरिका आईटी हार्डवेयर विनिर्माता आईबीएमके मुख्य अधिशासी का उल्लेख भी किया है जिन्होंने खुले तौर पर लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम)-आधारित एआई के कारोबार में आर्थिक समझदारी पर सवाल उठाया जिससे एआई पर इन बड़े दांवों के फाइनेंशियल जोखिमों के बारे में चिंताएं और बढ़ गईं। एआई के क्षेत्र में भारी उधार पर व्यापार को देखते हुए कहा गया है कि प्रतिभूति बाजार में एक गिरावट से वैश्विक वित्तीय बाजारों और उससे होकर वास्तविक अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि जापान में दीर्घकालिक सरकारी प्रतिभूतियों की कीमत में तेजी से हो रही गिरावट ( बॉन्ड की यील्ड में तेज बढ़ोतरी) एक और चेतावनी का संकेत है।

श्री नागेश्वरन ने अपनी इस रिपोर्ट में शहरीकरण पर एक विशेष निबंध लिखा है जिसमें शहरी जिंदगी और लोगों के सार्वजनिक व्यवहार में सुधार की जरूरत, ठोस कचरे के निष्पादन पर बल दिया गया है। उन्होंने कहा, “मेट्रो रेल परिसर में लोगों का व्यवहार बहुत साफ सुथरा होता है लेकिन उससे बाहर निकल कर वह बिल्कुल बदल जाता है।” उन्होंने ऐसी बातों के अध्ययन और प्रबंधन पर बल दिया।
उन्होंने ग्रीन एनर्जी पर जोर को अच्छा बताया पर उसमें लगने वाली सामग्री पर भी गौर करने की जरूरत पर बल दिया। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने मोटापा को देश में युवा आबादी के लाभ की राह में एक बड़ी चुनौती बताया।

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