भागीरथपुरा जल कांड : सरकार ने हाईकोर्ट में मानी 16 मौतें

इंदौर:भागीरथपुरा में दूषित पेयजल से हुई मौतों को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर मंगलवार को हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में ढाई घंटे से अधिक सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पेश डेथ ऑडिट रिपोर्ट में 23 मौतों का उल्लेख किया गया. जिनमें से 16 मौतें दूषित पानी से होना स्वीकार किया. हालांकि हाईकोर्ट ने रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए इसे सतही और अस्पष्ट करार दिया.

सुनवाई की शुरुआत में मुख्य सचिव अनुराग जैन करीब 10 मिनट तक वर्चुअल रूप से उपस्थित रहे. सरकार की ओर से बताया गया कि 23 मामलों में चार मौतों को लेकर असमंजस की स्थिति है, जबकि तीन मौतें दूषित पानी से नहीं मानी गई हैं. कोर्ट को यह भी बताया कि भागीरथपुरा के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से में जलापूर्ति बहाल कर दी गई है, जो करीब साढ़े नौ किलोमीटर क्षेत्र में फैली है.

न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए वर्बल ऑटॉप्सी शब्द पर आपत्ति जताते हुए पूछा कि यह मेडिकल टर्म है या प्रशासन द्वारा गढ़ा गया शब्द. कोर्ट ने पाया कि रिपोर्ट में मौत के कारण स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हैं और न ही उनके समर्थन में ठोस तर्क या प्रमाण संलग्न हैं, इसी आधार पर कोर्ट ने रिपोर्ट को अविश्वसनीय मानते हुए इसे महज ‘आई-वॉश’ बताया.

कोर्ट ने रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर उठाए सवाल
अदालत ने निर्देश दिए कि रिपोर्ट की विश्वसनीयता सिद्ध करने के लिए अधिक ठोस, प्रामाणिक और वैज्ञानिक दस्तावेज प्रस्तुत किए जाएं. साथ ही अंतरिम राहत के स्वरूप पर भी चिंता जताई गई. कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि गठित समिति अपने सुझावों का निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन कैसे सुनिश्चित करेगी, क्योंकि क्षेत्र में लगातार हो रही मौतें और उनके कारणों को लेकर अनिश्चितता बेहद चिंताजनक है. याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया कि रिपोर्ट में 16 मौतों को दूषित पानी से जोड़ा गया है, लेकिन रिमार्क कॉलम में इसका स्पष्ट उल्लेख तक नहीं है कि ये मौतें उसी महामारीनुमा स्थिति से हुईं या किसी अन्य कारण से. इस कॉलम में भ्रामक स्थिति दर्शाई गई है.

नई पाइपलाइन का काम पूरा तो फिर दूषित पानी कैसे पहुंचा
नगर निगम की ओर से बताया गया कि जिन 16 बोरवेल से गंदा पानी आ रहा था, उन्हें बंद कर दिया गया है. इस पर याचिकाकर्ता ने मांग की कि इन बोरवेल को सील किया जाए. निगम का तर्क रहा कि पूरी तरह सील करने से अन्य घरेलू उपयोग प्रभावित होगा, इसलिए पेम्फलेट और पोस्टर के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा रहा है. इस पर यह भी कहा गया कि क्षेत्र के अधिकांश रहवासी अशिक्षित हैं, ऐसे में केवल पोस्टर से जागरूकता कैसे संभव है. निगम की ओर से यह भी बताया कि हाल ही में 9.5 किलोमीटर लंबी नई पाइपलाइन डाल दी है. याचिकाकर्ता ने इस पर सवाल उठाया कि फरवरी 2023 में जारी टेंडर के अनुसार जनवरी 2026 तक 80 प्रतिशत काम पूरा बताया था और शेष कार्य एक माह में होना था, तो फिर दूषित पानी लोगों तक कैसे पहुंचा.

पानी की टेस्टिंग को लेकर भी लापरवाही
पानी की टेस्टिंग को लेकर भी विवाद सामने आया. याचिकाकर्ता ने कहा कि निगम ने केवल 8 मानकों पर जांच की, जबकि 2018 में मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 34 मानकों पर जांच कर पानी को फीकल कंटामिनेटेड पाया था. ऐसे में कई मौतों के बाद भी सीमित मानकों पर जांच करना गंभीर लापरवाही है. मुआवजे को लेकर भी कोर्ट में तथ्य सामने आए कि मृतकों के परिजनों को दी जा रही दो-दो लाख रुपये की सहायता रेडक्रॉस सोसायटी की ओर से है, न कि शासन की ओर से. याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि अन्य हादसों में शासन चार-चार लाख रुपये का मुआवजा देता है, लेकिन दूषित पानी से मरने वालों के मामले में सरकार की ओर से अब तक कोई प्रत्यक्ष सहायता नहीं दी गई.

सुनवाई के अंत में हाईकोर्ट ने नगर निगम को वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा सुझाए गए परीक्षणों पर गंभीरता से विचार करने और कोर्ट द्वारा उठाई गई सभी आपत्तियों पर स्पष्ट व ठोस जवाब पेश करने के निर्देश दिए. साथ ही न्यायालय परिसर में स्वच्छता और सुरक्षित जलापूर्ति को लेकर भी संज्ञान लेते हुए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए. मामले में कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रख लिया है.

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