अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण भारत की सभ्यतागत यात्रा का निर्णायक क्षण : राधाकृष्णन

नयी दिल्ली 20 जनवरी (वार्ता) उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा है कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण भारत की सभ्यतागत यात्रा का एक निर्णायक क्षण है जिसमें आस्था, इतिहास, कानून और लोकतंत्र की गरिमा का एक-दूसरे के साथ संगम दिखाई देता है। श्री राधाकृष्णन ने मंगलवार को यहां उपराष्ट्रपति भवन में केन्द्र सरकार में पूर्व सचिव रहे सुरेन्द्र कुमार पचौरी की पुस्तक “चैलिस ऑफ एम्ब्रोसिया: राम जन्मभूमि – चैलेंज एंड रिस्पॉन्स” के विमोचन के दौरान यह बात कही।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह पुस्तक भगवान श्रीराम के जन्मस्थान को पुनः प्राप्त करने के लिए सदियों से चले आ रहे संघर्ष को समाहित करती है और ऐतिहासिक घटनाक्रम को संतुलन, संवेदनशीलता और विद्वतापूर्ण संयम के साथ प्रस्तुत करती है।

उन्होंने कहा कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण भारत की सभ्यतागत यात्रा का एक निर्णायक क्षण है, जहां आस्था, इतिहास, कानून और लोकतंत्र का गरिमा के साथ एक-दूसरे के साथ संगम हुआ है। उन्होंने कहा कि भले ही देश में कहीं और हजारों मंदिर बनाए जाएं लेकिन भगवान श्रीराम के जन्मस्थान पर बने मंदिर के महत्व की तुलना किसी से नहीं की जा सकती।

श्री राधाकृष्णन ने कहा कि भगवान श्रीराम राष्ट्र की आत्मा हैं और भारत के धर्म की आत्मा भी। उन्होंने जोर देकर कहा कि धर्म कभी पराजित नहीं हो सकता और सत्य की सदैव विजय होती है। महात्मा गांधी की रामराज्य की परिकल्पना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह न्याय, समानता और सभी के लिए गरिमा का प्रतीक है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भगवान श्रीराम के जन्मस्थान को स्थापित करने में जो लंबी प्रक्रिया अपनानी पड़ी, वह पीड़ादायक थी और अधिकांश अन्य देशों में ऐसी स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि यह भारतीय लोकतंत्र की शक्ति को दर्शाता है कि पूरे राष्ट्र की आस्था के बावजूद भूमि का आवंटन विधिसम्मत प्रक्रिया और साक्ष्यों के आधार पर ही किया गया। इसी कारण भारत को लोकतंत्र की जननी कहा जाता है।

वर्ष 2019 के उच्चतम न्यायालय के निर्णय का उल्लेख करते हुए श्री राधाकृष्णन ने कहा कि इस फैसले ने करोड़ों भारतीयों की लंबे समय से संजोई गई आकांक्षाओं को पूरा किया और भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। उन्होंने कहा कि राम मंदिर के निर्माण ने भारतीयों के आत्मसम्मान को पुनः स्थापित किया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि इतिहास लेखन साहित्य का सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य है क्योंकि इसमें भावनात्मक संतुलन और सत्य के प्रति निष्ठा की आवश्यकता होती है। लेखक की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि श्री पचौरी ने बिना किसी सनसनी या विकृति के राम जन्मभूमि आंदोलन के सार को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।

उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक दस्तावेजों में रही कमियों के कारण न्याय की यह लड़ाई लंबी चली। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की कि यह पुस्तक इस ऐतिहासिक आंदोलन के आधुनिक चरण का दस्तावेजीकरण करती है, जिससे आने वाली पीढ़ियां राष्ट्रीय आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना के लिए किए गए त्याग और संघर्षों से परिचित रह सकें। पुस्तक में उद्धृत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने पूर्ववर्ती संरचना के साक्ष्यों की ओर भी ध्यान दिलाया, जिसने न्यायिक निर्णय को आधार प्रदान किया।

उपराष्ट्रपति ने निर्णय के बाद जन-प्रतिक्रिया को अभूतपूर्व बताया और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास द्वारा चलाए गए राष्ट्रव्यापी जनसहभागिता अभियान का स्मरण किया, जिसके माध्यम से विश्वभर के श्रद्धालुओं से 3,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि एकत्र की गई। उन्होंने 1990 के दशक में शिला पूजन में अपनी माता की भागीदारी का व्यक्तिगत स्मरण भी साझा किया।

इस अवसर पर श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास की निर्माण समिति के अध्यक्ष एवं प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय की कार्यकारी परिषद के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा, पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक विनोद राय, संघ लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष दीपक गुप्ता, उपराष्ट्रपति के सचिव अमित खरे, हर आनंद पब्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड के आशीष गोसाईं तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

 

 

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