देश के मेडिकल कॉलेजों में खाली पड़ी पीजी सीटों को भरने के लिए कटऑफ को ‘जीरो पर्सेंटाइल’ और स्कोर को ‘माइनस 40’ तक घटाने के फैसले पर विवाद गहरा गया है। रेजिडेंट डॉक्टरों के संगठन यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट (UDF) ने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए जनहित याचिका दाखिल की है। याचिका में नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस (NBEMS) के उस नोटिस को रद्द करने की मांग की गई है, जिसमें न्यूनतम योग्यता मानकों को अभूतपूर्व तरीके से घटाया गया है। डॉक्टरों का तर्क है कि सीटों को भरने के नाम पर शैक्षणिक गुणवत्ता से समझौता करना देश के स्वास्थ्य भविष्य के लिए बेहद खतरनाक साबित होगा।
गौरतलब है कि मेडिकल पीजी कोर्स की करीब 18 हजार खाली सीटों को भरने के उद्देश्य से सामान्य वर्ग की कटऑफ 50 से घटाकर सीधे 7 पर्सेंटाइल और अन्य श्रेणियों के लिए भी इसे न्यूनतम स्तर पर ला दिया गया है। UDF के अध्यक्ष डॉ. लक्ष्य मित्तल ने कहा कि शून्य या नकारात्मक अंक लाने वाले अभ्यर्थियों को विशेषज्ञ डॉक्टर बनने के लिए योग्य ठहराना मेडिकल पेशे की विश्वसनीयता को खत्म कर देगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से योग्य और मेहनती उम्मीदवारों के साथ अन्याय होगा और इसका सीधा नकारात्मक असर भविष्य में मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर पड़ेगा।
इस मामले को लेकर फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (FORDA) ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है। डॉक्टरों ने मांग की है कि सरकार इस फैसले पर तुरंत पुनर्विचार करे और न्यूनतम क्वालिफाइंग मानकों को फिर से बहाल करे। उनका कहना है कि सीटें खाली रहने का कारण योग्यता नहीं, बल्कि सीटों की भारी फीस और बुनियादी ढांचे की कमी है, जिसे सुधारने के बजाय कटऑफ कम करना गलत समाधान है। अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि क्या बिना योग्यता मानकों के डॉक्टर तैयार करना संवैधानिक रूप से सही है।

