जबलपुर: वाणिज्यिक न्यायालय से पूर्व मंत्री श्रवण पटेल को झटका लगा है। न्यायाधीश अजय रामावत ने पूर्व मंत्री श्रवण पटेल का वाद निरस्त कर दिया है। मामला मेसर्स मोहनलाल हरगोविंददास के विघटन से संबंधित था। न्यायालय ने मामले में स्पष्ट किया है कि वादी की ओर से ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे यह दर्शित हो कि उसनें फर्म को विघटन करनें की सूचना रजिस्ट्रार फर्म एंड सोसायटी को भी अधिनियम की धारा-63 में उपबंधित अनुसार दी है।
चूंकि वादी नें भागीदारी फर्म विघटन किए जाने की सूचना से सम्बंधित सूचना-पत्र एवं उसकी सभी भागीदारों पर तामीली की साक्ष्य प्रस्तुत करके फर्म के विघटन की सूचना को प्रमाणित नहीं किया है। इसलिए वादी की ओर से प्रस्तुत किए गए न्यायदृष्टांतों के आधार पर उसे कोई सहायता प्राप्त नहीं होती। मात्र वाद प्रस्तुत कर देने और उसके प्रमाण में कोई मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं करनें के कारण वादी को विधि अनुसार इस न्यायालय के द्वारा कोई सहायता प्रदान नहीं की जा सकती है।
इस वाद में दो वैकल्पिक एवं परस्पर विरोधाभासी तर्क प्रस्तुत किए गए थे कि फर्म या तो वर्ष 2000 में भंग हो गई थी अथवा वर्ष 2005 में स्व. परमानंदभाई पटेल, जो फर्म में 51 प्रतिशत नियंत्रक हिस्सेदार थे, जिनके निधन के पश्चात स्वत: भंग हो गई। अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्यों के समुचित मूल्यांकन के पश्चात, विचारण न्यायालय ने दोनों ही तर्कों को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने यह पाया कि सात फरवरी 2000 का कथित पत्र, जिसे स्व. परमानंद भाई पटेल द्वारा जारी बताया गया था, जिस पर सिद्धार्थ पटेल व मोहनलाल हरगोविंददास बीड़ी उद्योग प्राइवेट लिमिटेड ने भरोसा किया थाए सिद्ध नहीं किया जा सका।
न्यायालय ने साझेदारी करार की धारा-16 पर विशेष रूप से भरोसा किया, जिसमें यह स्पष्ट प्रावधान है कि किसी साझेदार की मृत्यु से फर्म का विघटन नहीं होगा तथा यह भी पाया कि धारा 10 (क) एवं 10(ख) लागू नहीं होतीं, क्योंकि स्व. परमानंदभाई पटेल द्वारा अपनी मृत्यु पर फर्म के विघटन संबंधी कोई निर्देश नहीं छोड़ा गया था। परिणामस्वरूप न्यायालय ने यह निर्णीत किया कि मेसर्स मोहनलाल हरगोविंद दास न तो वर्ष 2000 में और न ही वर्ष 2005 में भंग हुई थी तथा आज भी अस्तित्व में है। साथ ही, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्ष 2000 में फर्म का व्यवसाय मोहनलाल हरगोविंद दास बीड़ी उद्योग प्रायवेट लिमिटेड को कभी भी वैध रूप से हस्तांतरित नहीं किया गया।
