जांच में पूरा सहयोग, रिपोर्ट अब तक नहीं मिली: कुलपति

वेटरनरी विश्वविद्यालय में 3.50 करोड़ की पंचगव्य योजना के आरोपों पर कुलपति ने रखा अपना पक्ष

जबलपुर: नानाजी देशमुख पशु चिकित्सालय विश्वविद्यालय में पंचगव्य योजना के तहत गोबर और गोमूत्र पर शोध के लिए स्वीकृत 3 करोड़ 50 लाख रुपये की राशि को लेकर घोटाले के आरोप सामने आए हैं। इस मामले में विश्वविद्यालय के कुलपति मनदीप शर्मा ने प्रेस वार्ता कर जांच समिति द्वारा उठाए गए सवालों पर सफाई दी और कहा कि विश्वविद्यालय ने जांच में पूरा सहयोग किया है, लेकिन अब तक जांच रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई है। प्रेस वार्ता में कुलपति ने कहा कि परियोजना से जुड़े सभी दस्तावेज जांच समिति के समक्ष प्रस्तुत किए जा चुके हैं और विश्वविद्यालय ने जांच में पूरा सहयोग दिया है।

इसके बावजूद अब तक जांच समिति की रिपोर्ट विश्वविद्यालय को प्राप्त नहीं हुई है। कुलपति ने बताया कि वर्ष 2012 में राज्य स्तरीय स्वीकृति समिति द्वारा “पंचगव्य उत्पादों के विकास हेतु स्वदेशी गोवंश अनुसंधान केंद्र की स्थापना” परियोजना को मंजूरी दी गई थी। यह परियोजना राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत 3.50 करोड़ रुपये की राशि के साथ स्वीकृत हुई थी। परियोजना की रूपरेखा विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. यशपाल साहनी ने तैयार की थी और उन्हें ही इसका प्रमुख अन्वेषक नियुक्त किया गया था।
सभी उपकरण विवि में उपलब्ध हो रहे उपयोग
उन्होंने कहा कि परियोजना का मुख्य उद्देश्य स्वदेशी और विदेशी नस्लों के गोवंश के गोबर और मूत्र से पंचगव्य उत्पादों का निर्माण करना और उनके प्रभाव की तुलना करना था। कुलपति के अनुसार, परियोजना के दोनों उद्देश्य पूरे किए गए और कार्य पूर्ण होने के बाद इसकी संपूर्ण रिपोर्ट वित्तपोषण एजेंसी को भेजी गई। कुलपति ने स्पष्ट किया कि परियोजना के तहत उपकरणों की खरीदी, वाहन की व्यवस्था और अन्य खर्च विस्तृत परियोजना रिपोर्ट के अनुसार किए गए, जिसे वित्तपोषण एजेंसी ने पहले ही स्वीकृति दी थी। सभी उपकरण वर्तमान में विश्वविद्यालय में उपलब्ध हैं और उपयोग में लिए जा रहे हैं। वाहन की खरीदी भी मध्यप्रदेश शासन के क्रय-विक्रय नियमों के अनुसार की गई और इसका उपयोग केवल परियोजना के संचालन के लिए हुआ।
परियोजना में यात्रा भत्ते का था प्रावधान
उन्होंने यह भी बताया कि परियोजना में यात्रा भत्ते का प्रावधान था, जिसके अंतर्गत ही अधिकारियों और कर्मचारियों ने परियोजना से जुड़ी यात्राएं कीं। परियोजना से संबंधित सभी व्यय शासन के नियमों के तहत हुए और प्रत्येक भुगतान का लेखा परीक्षण के बाद ही निपटान किया गया। कुलपति के अनुसार, हर वर्ष परियोजना के खर्च का लेखा परीक्षण कराया गया और उपयोगिता प्रमाण पत्र तथा प्रगति प्रतिवेदन समय-समय पर वित्तपोषण एजेंसी को भेजे गए। अब तक वित्तपोषण एजेंसी की ओर से किसी प्रकार की आपत्ति दर्ज नहीं की गई है।

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