
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि महाधिवक्ता कार्यालय में विधि अधिकारियों की नियुक्ति में नियम का पालन क्यों नहीं किया गया। एक जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा व जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने विधि एवं विधायी कार्य विभाग के सचिव, महाधिवक्ता कार्यालय के अलावा सभी लॉ ऑफीसर्स को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। दरअसल, महाधिवक्ता कार्यालय में सरकारी वकीलों की नियुक्तियों को नियम विरुद्ध बताते हुए यह याचिका दायर कर की गई है।
मप्र हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के संयुक्त सचिव योगेश सोनी की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने पक्ष रखा। वहीं मप्र हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष डीके जैन की ओर से दायर हस्तक्षेप याचिका भी दायर की गई है। हस्तक्षेपकर्ता की ओर से अधिवक्ता पारितोष त्रिवेदी ने पक्ष रखा। न्यायालय को बताया गया कि महाधिवक्ता कार्यालय में कुल 157 लॉ ऑफिसर्स की नियुक्ति को लेकर 25 दिसंबर को सूची जारी की गई है। उन्होंने याचिका में आरोप लगाया गया है कि नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह मनमानी और पक्षपातपूर्ण है। याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2013 की राजपत्र अधिसूचना में सरकारी वकीलों की नियुक्ति के लिए स्पष्ट और निर्धारित प्रक्रिया तय की गई है, लेकिन महाधिवक्ता कार्यालय ने उसका स्पष्ट उल्लंघन किया। अधिसूचना में कहा गया था कि सरकारी अधिवक्ता की नियुक्ति के लिए न्यूनतम 10 वर्ष की प्रेक्टिस की योग्यता निर्धारित है। इसके उलट कई शासकीय अधिवक्ता ऐसे हैं जिनकी प्रेक्टिस 10 साल से बहुत कम है। यह दलील भी दी गई कि एक पद पर नियुक्ति के लिए तीन नाम भेजने का प्रावधान था। इसके उलट विज्ञापन में पदों की संख्या नहीं बताई गई थी। इसके अलावा नियुक्ति प्रक्रिया के संबंध में भी कोई उल्लेख नहीं किया गया था। मांग की गई कि पूरी सूची निरस्त कर नए सिरे से प्रक्रिया अपनाई जाये। सुनवाई पश्चात् न्यायालय ने अनावेदकों को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने के निर्देश दिये हैं।
