इंदौर: अब सवाल यह है कि शहर में गंदे या दूषित पानी वितरण की समस्या नई नहीं है, बल्कि सालों पुरानी है, जिसका निराकरण नहीं किया जा रहा है. अब शहर के हालात इस कदर बिगड़ चुके है कि अधिकारी, जनप्रतिनिधियों के नियंत्रण से बाहर हो चुके है. इसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है.आखिर क्या कारण हो सकता है कि जनता और क्षेत्र के लोग नगर निगम अधिकारियों और पार्षदों को गंदे पानी आने या दूषित जल वितरित होने की शिकायत कर रहे हैं. मगर समस्या का निराकरण नहीं किया जा रहा है.
यहां एक बात याद आ रही है कि पिछले साल नगर निगम द्वारा ही शहर के 75 से अधिक वार्डो में नर्मदा जल वितरण में गंदा पानी होने की जानकारी दी गई थी. उसमे मोहल्ला और कॉलोनियों के साथ वार्ड एवं झोन का उल्लेख भी किया गया था.इतने गंभीर मामले पर भी नगर निगम के अधिकारियों की नींद नही खुली. इससे बढ़कर निगम पर काबिज भाजपा के सांसद, महापौर, विधायक और पार्षदों का गंदे पानी की समय को दरकिनार करना क्या माना जाए?
ऐसा तो है नहीं कि जनप्रतिनिधियों को जानकारी नहीं है? जानकारी अधिकारियों से लेकर पार्षद तक सबको होती है, लेकिन भ्रष्टाचार में उलझे हुए रहने से अधिकारी नेताओं पर हावी हो चुके हैं. यही कारण है कि महापौर की विधानसभा वार पार्षदों के बैठक में अधिकारियों के नहीं सुनने की बात सामने आई. कई पार्षद अधिकारियों के नाम का रोना रोते नजर आए.
मुद्दा यह है कि देश के आठ बार के स्वच्छ शहर में वर्षो से नर्मदा जल में गंदा पानी सप्लाय हो रहा है। विकास का ढिंढोरा पीटा जाता है, पूरे शहर में उखाड़ पछाड़ मची हुई है. हजारों करोड़ रुपए के लागत से अमृत योजना में पानी सप्लाई करने पर खर्च हो रहा है, लेकिन नर्मदा पीने के पानी में दूषित और गंदा पानी आना बंद करने की कोई कोशिश और योजना नहीं बनी है.
ऐसा कहा जा सकता है कि यदि शहर में नर्मदा पानी में गंदा इसी तरह मिलता रहा तो आने वाले दिनों और कुछ महीनों में शहर दूषित जल जनित बीमारी पीलिया, टायफाइड, डायरिया , डिहाइड्रेशन के कारण मृत्यु जैसी घातक स्थिति उत्पन्न होगी. समय रहते यदि दूषित पानी वितरण की समस्या का हल या निराकरण नहीं हुआ तो विकास एक तरफ रह जाएगा. इंदौर बीमारी जनित शहर के रूप में पहचान बना लेगा.
