कांग्रेस को संगठन तो मजबूत करना ही होगा

भारतीय राजनीति में संगठन की भूमिका केवल चुनावी ढांचे तक सीमित नहीं होती, बल्कि वही किसी भी दल की वैचारिक जीवटता, नेतृत्व की निरंतरता और कार्यकर्ताओं की राजनीतिक ऊर्जा को दिशा देता है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने हाल ही में एक पुरानी तस्वीर साझा करते हुए इसी प्रश्न को उठाया, तस्वीर में लालकृष्ण आडवाणी कुर्सी पर बैठे हैं और नरेंद्र मोदी ज़मीन पर बैठे एक सामान्य कार्यकर्ता की भूमिका में दिखाई दे रहे हैं. दिग्विजय सिंह ने इस दृश्य को उदाहरण बनाकर लिखा कि संगठन की असली शक्ति इसी में निहित होती है कि एक साधारण कार्यकर्ता भी समय आने पर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बन सके. दिग्विजय सिंह का यह संकेत केवल अतीत की एक घटना का स्मरण नहीं, बल्कि कांग्रेस के संगठनात्मक भविष्य को लेकर गंभीर आत्ममंथन का आग्रह प्रतीत होता है. आज जब राजनीति का स्वरूप चुनावी मैनेजमेंट और तात्कालिक गठबंधनों तक सिमटता दिखाई देता है, तब संगठन की बुनियादी मज़बूती एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आती है. स्वयं कांग्रेस के भीतर भी अनेक वरिष्ठ नेता व पुराने कार्यकर्ता समय-समय पर इस चिंता को व्यक्त करते रहे हैं कि दल की सबसे बड़ी कमजोरी आज उसके जमीनी ढांचे की ढिलाई और कार्यकर्ता-नेतृत्व संवाद की कमी है. दिग्विजय सिंह के बयान का निहितार्थ इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए. उन्होंने न तो किसी व्यक्ति-विशेष की आलोचना की, न ही किसी गुटीय राजनीति को हवा देने का प्रयत्न. बल्कि यह संदेश देने की कोशिश की कि एक राष्ट्रीय दल के रूप में कांग्रेस के लिए मज़बूत संगठन केवल चुनावी आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय भूमिका निभाने की पूर्वशर्त है. भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र में अनेक सशक्त राष्ट्रीय दलों का होना देश की एकता, संतुलन और राजनीतिक स्थिरता के लिए भी जरूरी माना जाता है. ऐसे में एक सक्रिय, विचारधारा-संचालित और जमीनी स्तर पर जीवंत कांग्रेस का बने रहना राष्ट्रहित से जुड़ा प्रश्न है.

स्वाभाविक है कि जब कांग्रेस के ‘राष्ट्रीय नेतृत्व’ की बात उठती है, तो नेहरू-गांधी परिवार का नाम सामने आता है. दिग्विजय सिंह का संकेत भी कहीं न कहीं इस दिशा में प्रतीत होता है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को संगठन के पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी अधिक सक्रियता से संभालनी होगी. केवल वैचारिक वक्तव्यों या राजनीतिक अभियानों से आगे बढक़र संगठन को कार्यकर्ता-केन्द्रित, संवाद समर्थ और प्रशिक्षण आधारित ढांचे में परिवर्तित करना समय की मांग है.

आज की राजनीति में नेतृत्व का अर्थ केवल शीर्ष पदों पर बैठे चेहरे नहीं, बल्कि उन अनगिनत कार्यकर्ताओं की आवाज़ से भी है जो गांव, कस्बों और मोहल्लों में पार्टी की पहचान बनाते हैं. अगर कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर नई ऊर्जा के साथ उभरना है, तो उसे अपनी जड़ों तक लौटते हुए उसी मॉडल को अपनाना होगा जिसमें संगठन कार्यकर्ता को अवसर देता है, उसे आगे बढ़ाता है और नेतृत्व को स्थायी बनाता है. इस दृष्टि से दिग्विजय सिंह की टिप्पणी किसी आलोचना की तरह नहीं, बल्कि एक रचनात्मक चेतावनी की तरह देखी जानी चाहिए. यह कांग्रेस के लिए आत्मविश्लेषण का अवसर है कि वह इतिहास की सबसे पुरानी राजनीतिक परंपरा के रूप में अपनी वैचारिक विरासत को संगठनात्मक मज़बूती में कैसे बदलती है. क्योंकि अंतत: मज़बूत संगठन ही मज़बूत विपक्ष और सशक्त लोकतंत्र की गारंटी होता है.

 

 

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