ज़मीन नीलामी के खिलाफ आदिवासी समाज का ऐतिहासिक जनआंदोलन

आलीराजपुर। आदिवासी समाज की ज़मीन नीलामी के खिलाफ मंगलवार को कुक्षी में एक ऐतिहासिक और निर्णायक जनआंदोलन देखने को मिला। आलीराजपुर जिले से बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता, पदाधिकारी एवं जनप्रतिनिधि इस आंदोलन में सहभागिता के लिए कुक्षी पहुँचे। आदिवासी समाज के हक–हकूक की रक्षा के लिए उठी इस आवाज़ ने पूरे क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक हलचल पैदा कर दी।

कुक्षी के विजय स्तंभ चौराहे पर कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में आदिवासी समाज द्वारा विशाल, शांतिपूर्ण एवं प्रभावी धरना–प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस जनआंदोलन में ग्रामीण क्षेत्रों से आए आदिवासी समाज के महिला–पुरुष, युवा, बुज़ुर्ग तथा बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता शामिल हुए। प्रदर्शन स्थल पर नारेबाज़ी, तख्तियों और भाषणों के माध्यम से सरकार की नीतियों के प्रति गहरा आक्रोश और एकजुटता स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

धरना–प्रदर्शन में मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, पूर्व मंत्री एवं कुक्षी विधायक सुरेंद्रसिंह (हनी) बघेल, आदिवासी विकास परिषद के प्रदेश उपाध्यक्ष महेश पटेल सहित अनेक जनप्रतिनिधियों और सामाजिक नेताओं की गरिमामयी उपस्थिति रही।

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने अपने संबोधन में कहा कि आदिवासी समाज की ज़मीन की नीलामी संविधान की मूल भावना, पेसा कानून और आदिवासी अधिकारों का खुला उल्लंघन है। उन्होंने भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार पूंजीपतियों के हित में निर्णय ले रही है और आदिवासियों की पुश्तैनी ज़मीन छीनी जा रही है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि ज़मीन नीलामी की प्रक्रिया को तत्काल बंद नहीं किया गया, तो कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को सड़क से सदन तक पूरी ताकत से उठाएगी।

पूर्व मंत्री एवं कुक्षी विधायक सुरेंद्रसिंह (हनी) बघेल ने कहा कि कुक्षी और आसपास का आदिवासी अंचल अपने जल, जंगल और ज़मीन के लिए सदैव संघर्ष करता रहा है और आगे भी करेगा। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि आदिवासी समाज के साथ अन्याय किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने प्रशासन से ज़मीन नीलामी की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की मांग करते हुए कहा कि वे जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस आंदोलन का नेतृत्व करेंगे।

आदिवासी विकास परिषद के प्रदेश उपाध्यक्ष महेश पटेल ने प्रशासन और सरकार को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि आदिवासी समाज की ज़मीन उसकी पहचान, अस्तित्व और जीवनरेखा है। उन्होंने कहा कि ग्रामसभा की सहमति के बिना लिया गया कोई भी निर्णय आदिवासी समाज स्वीकार नहीं करेगा। यदि सरकार ने ज़मीन नीलामी का निर्णय वापस नहीं लिया, तो आंदोलन को और अधिक व्यापक, संगठित और तीव्र किया जाएगा।

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