अरावली संरक्षण नियमों में कोई ढील नहीं: भूपेंद्र यादव

नयी दिल्ली, (वार्ता) अरावली पर्वत श्रृंखला को लेकर जारी विवाद के बीच, पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने रविवार को स्पष्ट किया कि इस क्षेत्र की संरक्षित स्थिति में कोई ढील नहीं दी गई है।
संवाददाताओं से बातचीत करते हुए श्री यादव ने कहा, “अरावली चार राज्यों—दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के 39 जिलों में फैली हुई है। अरावली से संबंधित कानूनी याचिका 1985 से चल रही है। हम अरावली में खनन के खिलाफ सख्त नियमों का समर्थन करते हैं।”
उन्होंने उच्चतम न्यायालय के एक निर्देश का हवाला दिया, जिसमें चारों राज्यों में अरावली की एक समान परिभाषा लागू करने की बात कही गई है।
श्री यादव ने बताया, “इस परिभाषा के अनुसार, रिचर्ड मर्फी के 1968 के भूगर्भीय अध्ययन के आधार पर अरावली की 100 मीटर की आधार संरचना पर संरक्षण लागू होता है। कुछ गलत सूचनाएं फैलाई गई हैं कि 100 मीटर का नियम ऊपर (चोटी) से लागू होता है, जो कि गलत है। संरक्षण आधार से शुरू होता है, चाहे वह जमीन के नीचे से ही क्यों न शुरू हो। इन क्षेत्रों में खनन नहीं किया जा सकता।”
श्री यादव ने कहा कि यदि अरावली के दो हिस्से एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर हैं, तो उनके बीच के अंतर को भी पर्वत श्रृंखला का हिस्सा माना जाता है। उन्होंने उल्लेख किया, “इस परिभाषा ने अरावली के 90 प्रतिशत से अधिक हिस्से को संरक्षण के दायरे में ला दिया है।”
अरावली पर्वतमाला का कुल क्षेत्रफल लगभग 1.47 लाख वर्ग किलोमीटर है। खनन केवल इस क्षेत्र के लगभग 2 प्रतिशत हिस्से में ही अनुमत है, जो 39 जिलों में लगभग 217 वर्ग किलोमीटर बैठता है।
श्री यादव ने स्पष्ट किया, “इस सीमित क्षेत्र में भी सभी प्रकार के खनन की अनुमति नहीं है।”

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