मेसी का दौरा शानदार, लेकिन फुटबॉल को कोई ठोस फायदा नहीं

अनादि बरुआ (पूर्व इंडिया इलेवन फुटबॉल खिलाड़ी और सीनियर नेशनल महिला फुटबॉल टीम के पूर्व हेड कोच)
नयी दिल्ली, 21 दिसंबर (वार्ता) भारतीय फुटबाल के जाने माने खिलाड़ी रहे अनादि बरूआ का मानना है कि फुटबाल के अंतरराष्ट्रीय सितारे लियोनेल मेसी के भारत दौरे ने भीड़ तो बहुत खींची लेकिन इससे देश में फुटबाल को बढ़ावा देने में कोई मदद नहीं मिली। बरूआ ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि लियोनेल मेसी अब तक के सबसे अच्छे फुटबॉलरों में से एक हैं और हमारे देश में ऐसी मशहूर हस्तियों की मेजबानी करना हमेशा यादगार होता है। हालांकि, लुइस सुआरेज और रोड्रिगो डी पॉल के साथ उनके इस दौरे से भारत में आम तौर पर खेल और विशेषकर फुटबॉल को बढ़ावा देने में कोई मदद नहीं मिली। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र के लोगों द्वारा आयोजित मेसी का यह दौरा फुटबॉल के लिहाज से तब अधिक सार्थक होता जब वह यहां की राष्ट्रीय टीम या कोई स्थानीय क्लब के खिलाफ मैच खेलते, जैसा कि पेले ने 1977 में मोहन बागान के खिलाफ खेला था। यह तब भी सार्थक हो सकता था जब वह किसी अकादमी का दौरा करते और उभरते हुए फुटबॉल खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देते। इसके अलावा अगर वह गरीब बच्चों से मुलाकात कर उनसे बातचीत करते तो इसका कुछ सामाजिक महत्व होता। हालांकि, यह दौरा मार्केटिंग को लेकर था। विदेश के लोग जानते हैं कि भारत एक बहुत बड़ा बाजार है, इसलिए यह दौरा अधिकतर इंटर मियामी का विज्ञापन करने और अगले साल होने वाले विश्व कप के बारे में चर्चा पैदा करने के लिए था।

बरूआ ने कहा कि जिन लोगों ने कभी यह खेल नहीं खेला और जिनका इस खेल से असल में कोई लेना-देना नहीं था, वे इस दौरे के दौरान अर्जेंटीना के इस दिग्गज के साथ फोटो खिंचवाने के लिए सबसे अधिक उत्सुक दिखे। मेसी के दौरे के दौरान हमने कुछ अजीब हरकतें देखीं, उनमें से एक थी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के अध्यक्ष जय शाह का उन्हें क्रिकेट बैट देना, जिस पर 2024 का आईसीसी पुरुष टी-20 विश्व कप जीतने वाली भारतीय टीम के खिलाड़ियों के खास साइन और ऑटोग्राफ थे। उन्होंने कहा कि यह भी देखना होगा कि दिग्गज फुटबॉलर का दौरा ऐसे समय में हुआ जब हमारा फुटबॉल अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। एक तरफ हमारी सीनियर पुरुष टीम दुनिया में 142वें नंबर पर है (19 नवंबर, 2025 की फीफा रैंकिंग) और दूसरी तरफ आईएसएल सीजन को लेकर अनिश्चितताएं हैं। जब हम फुटबॉल की बात करते हैं, तो हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि लगभग सभी देश यह खेल खेलते हैं, उनमें से अधिकतर लोग इस ‘खूबसूरत खेल’ को बहुत जुनून से फॉलो करते हैं। इसलिए अगर हमें एक महत्वपूर्ण फुटबॉलिंग देश बनना है, तो हम एक मजबूत खेल संस्कृति के बिना ऐसा नहीं कर सकते। बरूआ ने कहा कि फुटबॉल संस्कृति बनाने के लिए तीन चीजें जरूरी हैं। सबसे पहला, माता-पिता को अपने बच्चों को फुटबॉल खेलने के लिए प्रोत्साहित और समर्थन करना चाहिए। दूसरा, स्कूलों में फुटबॉल का ढांचा होना चाहिए, और आखिर में, पाठ्यक्रम में खेल- कूद की गतिविधियों के लिए प्रयाप्त समय होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि अगर हम आईएसएल को देखें, तो पहले दो सीजन बहुत अच्छे थे, हालांकि कुछ संरचनात्मक दिक्कतों के कारण इसकी गुणवत्ता पर असर पड़ा। प्रारुप में डिमोट करने की प्रक्रिया और प्रोत्साहन प्रणाली नहीं है, इसलिए कोई इनाम और सजा का मैकेनिज्म नहीं था। कोई क्लब कितना भी खराब खेले, उन्हें पता था कि उन्हें बाहर नहीं किया जाएगा। इसलिए सुधार करने की कोई प्रेरणा नहीं मिलती। यह उस स्कूली लड़के की तरह है जिसे पता है कि वह फेल नहीं होगा, इसलिए वह अपनी पढ़ाई को नजरअंदाज करता रहता है। बरूआ ने कहा कि आईएसएल के साथ एक और बड़ी समस्या यह है कि अधिकतर टीमों में स्ट्राइकर पोजीशन पर विदेशी खिलाड़ी खेलते हैं, इसलिए काबिल भारतीय फॉरवर्ड तैयार नहीं हो पा रहे हैं। इसलिए राष्ट्रीय टीम के पास सुनील छेत्री की जगह लेने के लिए अच्छे स्ट्राइकर नहीं हैं। यहां मुख्य समस्या हमारे यूथ डेवलपमेंट सिस्टम के साथ है, क्योंकि भारत के लिए फॉरवर्ड तैयार करना आईएसएल क्लबों की जिम्मेदारी नहीं है। एक और गंभीर समस्या जिसका सामना हमारी राष्ट्रीय टीम करती है, वह यह है कि जब राष्ट्रीय मैच होते हैं तो क्लब खिलाड़ियों को रिलीज करने से मना कर देते हैं। उन्होंने कहा, ”इस संबंध में मैं कहूंगा कि अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) का ‘इंडियन एरोज’ प्रयोग बहुत अच्छा था, इसने बहुत सारे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को तैयार किया जो उन खिलाड़ियों की जगह ले सकते थे जो उपलब्ध नहीं थे”।

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