वेंकी अय्यर, सह-अध्यक्ष, और रुशभ गांधी, सदस्य, बीमा जागरूकता समिति (आईएसी-लाइफ), लाइफ इंश्योरेंस काउंसिल
भारत की जीवन बीमा कंपनियां तेज क्लेम निपटान, डिजिटल तरीक़े से निपटान की प्रक्रिया और सशक्त गवर्नेंस के माध्यम से भरोसा मज़बूत कर रही हैं। हालांकि, नामांकन से जुड़ी खामियां और धोखाधड़ी रोकने जैसी चुनौतियां अब भी हैं।
जीवन बीमा की असल वैल्यू न तो ब्रोशर में दिखती है और न ही मार्केटिंग अभियानों में, बल्कि इसका सही आकलन उस समय होता है जब कोई परिवार क्लेम दर्ज कराता है। जहां परिचालन दक्षता, नियामकीय ढांचा और मानवीय संवेदनशीलता एक साथ मिलते हैं वहीं उद्योग के वादे की वास्तविक परीक्षा होती है।
एक ऐसा उद्योग है जो अपने ग्राहकों के आर्थिक भविष्य को सुरक्षित करता है। मुश्किल समय में संबल देता है। उसके लिए दक्षता का असली पैमाना “सच का वह क्षण” है। आज भारत का जीवन बीमा इकोसिस्टम इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए आगे बढ़ रहा है। इसका प्रमाण क्लेम सेटलमेंट रेशियो (सीएसआर) में दिखाई देता है।
भरोसे का पैमाना
सीएसआर यह दर्शाता है कि जितने क्लेम मिले उनमें से कितने क्लेम का भुगतान किया गया। नियामकीय जरूरत होने के साथ अब यह पॉलिसीधारकों के लिए भरोसे का अहम संकेतक बन चुका है। उद्योग के आंकड़े बताते हैं कि औसत सीएसआर 98–99% के बीच मज़बूती से बना हुआ है। यह प्रमाण है कि जरूरत के समय भरोसेमंद और समय पर सहायता मिल रही है।
बेहतर क्लेम निपटान के कारण
क्लेम निपटान में आया यह सकारात्मक बदलाव उद्योग के डिजिटलीकरण और सुधारों का नतीजा है। इसमें प्रक्रियाओं में सुधार और उस समय ग्राहक की मदद पर अधिक ज़ोर शामिल है, जब उन्हें वित्तीय सहारे की सबसे अधिक ज़रूरत होती है।
नियामकीय सुधार: पॉलिसीधारकों के हितों की सुरक्षा (पीपीएचआई) नियमों के तहत क्लेम निपटान की समय-सीमा को कड़ा किया गया है। जिन क्लेम की जांच नहीं होती, उन्हें अब 15 दिनों में निपटाना अनिवार्य है। यह सीमा पहले 30 दिन था। जांच वाले क्लेम के लिए समय-सीमा 90 दिन से घटाकर 45 दिन कर दी गई है।
आंतरिक गवर्नेंस: बीमा कंपनियों के भीतर क्लेम समीक्षा समितियों ने आंतरिक नियंत्रण को सशक्त किया है। निष्पक्ष व एकरूप निर्णय सुनिश्चित किए हैं।
डिजिटल नवाचार: कागज रहित आवेदन, मोबाइल से दस्तावेज़ अपलोड और रियल-टाइम ट्रैकिंग जैसी सुविधाओं ने नामित व्यक्ति (नॉमिनी) के लिए शाखा जाए बिना क्लेम दर्ज करना और उसकी स्थिति जानना आसान बना दिया है।
पारदर्शी संवाद: बेहतर प्रक्रियाओं और स्पष्ट संचार से भ्रम कम हुआ है। अनावश्यक देरी भी घटी है। इन सुधारों ने ऐसा माहौल बनाया है, जहां ग्राहक और नामित व्यक्ति भरोसा कर सकते हैं कि क्लेम प्रक्रिया तेज़ और प्रभावी होगी। इन सुधारों ने ऐसा माहौल तैयार किया है, जहां ग्राहक और नामित व्यक्ति इस प्रक्रिया पर भरोसा करते हैं कि उन्हें तेज और प्रभावी परिणाम मिलेंगे।
आख़िरी स्तर की चुनौतियां
हालांकि उद्योग ने काफ़ी प्रगति की है, फिर भी सुचारु क्लेम निपटान सुनिश्चित करने में कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं।
नामांकन से जुड़ी समस्याएं: नामित व्यक्ति की जानकारी न होना, गलत होना या अपडेट न होना अक्सर देरी का कारण बनता है। पॉलिसीधारक जीवन की बड़ी घटनाओं के बाद भी नॉमिनी अपडेट करना भूल जाते हैं। जीवन बीमा कंपनियां इस बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं।
आधार एकीकरण: आधार-आधारित पहचान और पेमेंट सिस्टम के व्यापक एकीकरण से, खासकर ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में भुगतान प्रक्रिया और तेज़ व सरल हो सकती है।
धोखाधड़ी रोकथाम: बीमा घोटालों से निपटने के लिए सतर्कता जरूरी है। इसके लिए कंपनियां एनालिटिक्स आधारित फ्रॉड डिटेक्शन में निवेश कर रही हैं, ताकि असली लाभार्थियों को परेशानी न हो और प्रक्रिया सुरक्षित बनी रहे।
भरोसे को और मज़बूती
क्लेम केवल बैक-एंड प्रक्रिया नहीं हैं वे बीमाकर्ता की प्रतिबद्धता का सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। मज़बूत सीएसआर न केवल संस्थागत क्षमता को दर्शाता है, बल्कि संवेदनशीलता और जवाबदेही की संस्कृति को भी प्रतिबिंबित करता है। जैसे-जैसे भारत “2047 तक सबके लिए बीमा” के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, कुशल क्लेम सेवा उपभोक्ता भरोसे का सबसे सटीक पैमाना बनी रहेगी। अंततः, जीवन बीमा उद्योग की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह जीवन के सबसे कठिन क्षणों में समय पर वित्तीय सहायता देने में कितने सक्षम है।
