सुविधा के चक्कर में असुविधा के तहसील कार्यकाल बना दिए

वीरेंद्र वर्मा
इंदौर: ग्रामीण क्षेत्र की जनता को सुविधा देने के चक्कर में सरकार ने शहरी क्षेत्र की जनता को मुसीबत में डाल दिया. शहरी क्षेत्र में स्थित कॉलोनियों और मोहल्लों के रहवासियों को जंगल में बने एसडीएम और तहसील कार्यालय जाकर काम कराना पड़ रहा है. हकीकत यह है कि तहसील के अनुसार बने कार्यालय से न ग्रामीण को और न ही शहरी लोगों को फायदा मिल रहा है. इतना ही नहीं शहरी क्षेत्रों को तहसील में मनचाहे तरीके से बांट दिया गया है. इस वजह से जनता परेशान होकर समस्या से जूझ रही है. तहसील कार्यालय में पदस्थ अधिकारी,बाबू और कर्मचारी भी परेशान है.

सन् 2018 में सर्वे कर सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों की जनता की सुविधा देने के लिए तहसील मुख्यालय बनाने का निर्णय लिया. इसी तारतम्य में इंदौर को अलग अलग टुकड़ों में बांटकर तहसीलों में शामिल कर दिया गया. शहरी क्षेत्रों को तहसीलों में इतने गलत और मनमाने तरीके से बांटा गया है कि कई कॉलोनियों की दूरी तहसील कार्यालय से 15 से 20 किलोमीटर है. अधिकारियों की योजना का नमूना पेश है कि मल्हारगंज तहसील कार्यालय, टिगरिया बादशाह गांव में सुपर कॉरिडोर पार करके मेन रोड से 1 किलोमीटर अंदर, कनाडिया तहसील कार्यालय बायपास पार पूरा कनाडिया गांव छोड़कर 2 किलोमीटर बाहर, राऊ तहसील कार्यालय राऊ सर्कल से करीब साढ़े तीन किलोमीटर बायपास से 750 मीटर से ज्यादा अंदर बनाया गया है. उक्त कार्यालय को ढूंढने में ही आम लोगों को पसीना आ रहा है, क्योंकि यह मुख्य मार्ग इतने अंदर है कि कार्यालय खोजना भी एक बड़ा काम है.

5 से15 किलोमीटर जाना पड़ रहा है...
अब क्षेत्र पर बात करें तो राऊ तहसील में सुदामा नगर मेन और ए एवं बी सेक्टर राऊ में और डी तथा ई सेक्टर, स्कीम 71 से लेकर द्वारकापुरी कॉलोनी, सिरपुर, मल्हारगंज तहसील क्षेत्र में, पलासिया, तिलक नगर जैसी कॉलोनियां कनाडिया तहसील क्षेत्र में शामिल कर दी गई. अब विडंबना देखिए कि महूनाका, या भंवरकुआ के रहवासी को बायपास स्थित राऊ बायपास पार कर, नर्सिंग बाजार, लोधीपुरा और छत्रीबाग के रहवासी को सुपर कॉरिडोर पार करके टिगरिया बादशाह गांव और पलासिया, तिलकनगर के रहवासी को बायपास पार करके 5 से लेकर 15 किलोमीटर तक जाना पड़ रहा है. पहले उक्त सभी क्षेत्रों के रहवासियों को शहर के मध्य स्थित कलेक्टर कार्यालय न सिर्फ पास था, बल्कि चार बार आने जाने में सुविधा भी थी, क्योंकि कलेक्टर कार्यालय पर सभी क्षेत्रों से सिटी बस और लोक परिवहन सुविधा आसानी से उपलब्ध होती थी.

विसंगतियों के भंवर में उलझे यह कार्यालय

1. मुख्य रोड से कार्यालय तक परिवहन की सुविधा नहीं.
2. कार्यालय पर अधिकारियों और बाबुओं के मिलने का समय तय नहीं.
3. कलेक्टर कार्यालय में बैठक है तो दो घंटे अधिकारी का सीट में मिलना नामुमकिन.
4. बैठक में भाग लेने के लिए हर एसडीएम और तहसीलदार को आने में 45 मिनिट और जाने में 45 मिनिट का समय लग रहा है।
5. जनता को नए कार्यालय मालूम नहीं, मालूम है तो बिना साधन के जाना संभव नहीं.
6. ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली के चलते कंप्यूटर बंद.
7. जनता , कर्मचारियों और बाबू को आने जाने में जान का खतरा, क्योंकि सभी कार्यालय जाने के लिए बायपास या सुपर कॉरिडोर जैसे भारी वाहन वाली सड़क को पार करना.
8. फोटोकॉपी से लेकर नोटरी तक के लिए शहर में आना या कम से कम 5 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है.
9. तहसील कार्यालय तो बन गए, लेकिन पहुंच मार्ग कच्चे पक्के और गड्डे भरे रास्ते पर है.
10. कार्यालयों के आसपास रेस्टोरेंट नहीं और अधिकारी सीट पर ज्यादातर मिलते नहीं.11. निम्न आय वर्ग, आय, जाति, मूल निवासी, नामांतरण, सीमांकन , बंटांकन आवेदन के लिए 15 से 20 किलोमीटर दूरी के बाद कोई दस्तावेज या टिकिट नहीं लगा है, तो उसकी पूर्ति के लिए आसपास कोई सुविधा नहीं. शहर में आकर ही काम होता है. फिर वापस जाना सबसे बड़ी परेशानी है.
12. सबसे बड़ी बात यह है कि अधिकारियों की गाड़ी का डीजल और पेट्रोल खर्च बढ़ गया है.
13. कर्मचारियों को भी फोटोकॉपी के लिए कार्यालय के बाहर जाना पड़ता है. मतलब एक बार में 30 मिनिट से 45 मिनट या एक घंटा तक लग जाता है.
14. जनरेटर की सुविधा नहीं, कार्यालय पर बिजली जाने की स्थिति में पूरा काम बंद हो जाता है.
15. अधिकारियों और बाबुओं के आने जाने और साइट पर मिलने का समय तय नहीं है. बाबू साहब के काम से मुख्यालय, साहब बैठक में और आरआई, पटवारी फील्ड में या तहसीलदार के साथ मौका मुआयना करने में व्यस्त होते हैं

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