नयी दिल्ली, 18 दिसंबर (वार्ता) राज्यसभा में गुरुवार को विपक्षी दलों ने मनरेगा का स्थान लेने वाले विकसित भारत जी-राम-जी विधेयक के जरिये केंद्र सरकार को सारी शक्ति देने का आरोप लगाते हुए विधेयक को वापस लेने की मांग की जबकि सत्ता पक्ष के लोगों ने कहा कि इससे मनरेगा में मौजूदा समय में व्याप्त भ्रष्टाचार समाप्त होगा।
लोकसभा में आज ही इस विधेयक के पारित होने के कुछ घंटे बाद ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसे राज्यसभा में चर्चा के लिए प्रस्तुत किया। कांग्रेस के मुकुल वासनिक ने चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि इस कानून का असर देश के करोड़ों गरीबों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि साल 2004 में जब मनरेगा का विधेयक लाया गया था उस समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने उसे आम सहमति से पारित कराया था, “दुर्भाग्य से इस सरकार ने आम सहमति कि पहल नहीं की है”।
श्री वासनिक ने विधेयक के प्रावधानों की तुलना करते हुए कहा कि मनरेगा में पूरे साल कभी भी काम मांगने पर 15 दिन में रोजगार, नहीं तो बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान था। उसमें शत-प्रतिशत केंद्रीय आवंटन की व्यवस्था थी और सामग्री में 75 प्रतिशत केंद्र सरकार द्वारा दिया जाता था। कौन सा काम होगा यह पंचायत तय करता था।
मौजूदा विधेयक में पंचायत नहीं केंद्र तक करेगा कि कौन सा काम होगा। यह विधेयक लाने से पहले राज्यों से कोई बात नहीं की गयी, उन्हें विश्वास में लेने का काम नहीं किया गया। कांग्रेस सांसद ने कहा, “संघीय व्यवस्था में इस तरह से काम नहीं हो सकता।”
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार शुरू में ही तय कर देगी कि किस राज्य को कितना आवंटन होना है। बाद में किसी राज्य में बाढ़ आयी, सूखा आया, बीमारी फैली और अतिरिक्त काम की जरूरत हुई तो यह राज्यों पर छोड़ा गया है कि वे अपनी तरफ से आवंटन बढ़ा सकते हैं, और फिर भी काम केंद्र सरकार के अनुसार करना होगा। उन्होंने कहा कि काम करते-करते मजदूरों की उंगलियों के निशान मिट चुके हैं उनसे बायोमीट्रिक हाजिरी की उम्मीद की जाती है।
श्री वासनिक ने कहा कि कोविड-19 महामारी के समय दो ही योजना काम आयी – राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना और मनरेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार को महात्मा गांधी के नाम से आपत्ति है। पुराने संसद के मुख्य द्वार के सामने से उनकी मूर्ति हटा दी गयी है। गुजरात में सरदार पटेल के नाम पर स्टेडियम था उसका भी नाम बदल दिया गया। उन्होंने कहा कि इस देश की मिट्टी के कण-कण में गांधी, (जवाहरलाल) नेहरू और पटेल बसे हुए हैं और “आप उन्हें मिटा नहीं सकते”। उन्होंने अंत में विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजने की मांग की।
हिमाचल से भाजपा की इंदुबाला गोस्वामी ने कहा कि यह विधेयक राष्ट्रपिता गांधी के सपनों को साकार करने वाला है। उन्होंने कहा कि खुद संप्रग सरकार ने 2009 में नरेगा के नाम में महात्मा गांधी का नाम जोड़कर उसे मनरेगा बनाया था।
उन्होंने कहा कि मनरेगा में मस्टर रोल में गड़बड़ी होती थी, झूठे मस्टर रोल बनाये जाते थे, काम होता नहीं था लेकिन भुगतान हो जाता था। सरकार उसी भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए यह विधेयक लायी है। नये कानून में काम की जानकारी रीयल-टाइम में मिल जायेगी। बुआई-कटाई के दौरान श्रमिक आसानी से उपलब्ध होंगे।
श्रीमती गोस्वामी ने कहा कि मोदी सरकार हर योजना में गांधी के सिद्धांतों को अपनाया है, 11 साल में 25 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला है, 80 करोड़ लोगों को मुफ्त में राशन दिया है।
राष्ट्रीय जनता दल के मनोज झा ने विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजने का अनुरोध करते हुए कहा कि आसमान नहीं टूट रहा है कि इसे तीन दिन में पारित कराना जरूरी है। राम के नाम से कोई आपत्ति नहीं है, नाम कुछ भी हो, लेकिन इस कानून की आत्मा समाप्त हो जायेगी। हम भी चाहते थे कि मनरेगा में व्यापक बदलाव हो और काम के दिन बढ़ें। सरकार को पहले मशविरा करना चाहिये था। उन्होंने कहा कि सरकार इसे “डिमांड ड्रिवेन से कमांड ड्रिवेन” बना रही है।
उन्होंने कहा कि बुवाई और कटाई के समय ब्लैक आउट दिन घोषित करने से मजदूरों को ज्यादा मजदूरी मिलने की संभावना समाप्त कर दी गयी है।
