नयी दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अंतर्गत गठित संसदीय समिति की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया। इस समिति का गठन न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास पर बेहिसाब नकदी मिलने के बाद शुरू की गई महाभियोग कार्यवाही के संबंध में उनके खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए किया गया था।
इस मामले में न्यायमूर्ति वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी, पेश हुए, जिन्होंने “एक्स” के नाम से गुमनाम रूप से याचिका दायर की है। यह पेशी न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की पीठ के समक्ष हुई।समिति के गठन की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए न्यायमूर्ति वर्मा ने तर्क दिया कि हालांकि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में महाभियोग नोटिस पेश किए गए थे लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ने राज्यसभा अध्यक्ष के प्रस्ताव को स्वीकार करने के निर्णय की प्रतीक्षा किए बिना और कानून के अंतर्गत अनिवार्य संयुक्त परामर्श के बिना एकतरफा रूप से समिति गठन किया।
न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के प्रावधानों का हवाला देते हुए श्री रोहतगी ने कहा कि अगर संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन किसी प्रस्ताव की सूचना दी जाती है तो वहां कोई समिति तब तक गठित नहीं की जा सकती जब तक कि प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार न हो जाए। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसी स्थिति में समिति का गठन लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए।
अधिनियम की धारा 3(2) के प्रावधान का हवाला देते हुए श्री रोहतगी ने इस बात पर बल दिया कि वैधानिक भाषा अनिवार्य है और प्रस्ताव “देने” और “स्वीकार करने” के बीच स्पष्ट रूप से अंतर करती है। उन्होंने कहा कि यद्यपि अलग-अलग तिथियों पर स्वीकार हो सकता है, लेकिन वर्तमान मामले में प्रस्ताव दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्तुत किए गए थे इसलिए संयुक्त रूप से गठित समिति की आवश्यकता थी।
श्री रोहतगी ने स्पष्ट किया कि जहां कोई प्रस्ताव केवल एक सदन में स्वीकार किया जाता है वहां समिति का गठन केवल उसी सदन द्वारा किया जा सकता है लेकिन वर्तमान मामले में ऐसी स्थिति नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि दोनों सदनों का संवैधानिक दर्जा समान है इसलिए जब प्रस्ताव एक साथ पेश किए गए हैं तो एक संयुक्त समिति अनिवार्य है।
न्यायमूर्ति दत्ता ने सुनवाई के दौरान सवाल किया कि अगर दो प्रस्ताव एक ही दिन दोनों सदनों में प्रस्तुत किए जाते हैं तो एक ही दिन में स्वीकृति कैसे संभव हो सकती है। श्री रोहतगी ने जवाब दिया कि उनका तर्क एक ही दिन में स्वीकृति पर आधारित नहीं है बल्कि इस तथ्य पर आधारित है कि प्रस्ताव एक ही दिन “प्रस्तुत” किए गए थे, जो क़ानून के अंतर्गत एक संयुक्त समिति की आवश्यकता को जन्म देता है।
गौरतलब है कि जुलाई में लोकसभा के 145 सदस्यों और राज्यसभा के 63 सदस्यों ने महाभियोग नोटिस क्रमशः लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा अध्यक्ष जगदीप धनखड़ को सौंपा था।
लोकसभा अध्यक्ष ने अगस्त में उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम.एम. श्रीवास्तव और कर्नाटक उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता वासुदेव आचार्य की एक जांच समिति के गठन की घोषणा की थी।
यह मामला 14 मार्च को आगजनी के बाद आग बुझाने के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास के एक बाहरी कमरे में बड़ी मात्रा में करेंसी नोटों के बरामदगी से संबंधित है।
इसके बाद, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने एक आंतरिक जांच समिति का गठन किया था, जिसमें न्यायमूर्ति शील नागू (तत्कालीन पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश), न्यायमूर्ति जी.एस. संधावालिया (तत्कालीन हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश) और न्यायमूर्ति अनु शिवरामन (कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश) शामिल थे। जांच लंबित रहने तक, न्यायमूर्ति वर्मा को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वापस भेज दिया गया और उन्हें न्यायिक कार्यभार से मुक्त कर दिया गया।
समिति ने मई में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें प्रथम दृष्टया उन्हें दोषी पाया गया।सलाह दिए जाने के बावजूद न्यायमूर्ति वर्मा द्वारा इस्तीफा देने से इनकार करने के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने रिपोर्ट को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेज दिया था। इससे पहले शीर्ष अदालत ने न्यायमूर्ति वर्मा द्वारा आंतरिक जांच कार्यवाही के साथ-साथ मुख्य न्यायाधीश द्वारा उन्हें पद से हटाने की सिफारिश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया था।
