बेंगलुरु, (वार्ता) कर्नाटक उच्च न्यायालय की धारवाडृ खंडपीठ ने बुधवार को गत 14 मई के उस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया जिसमें सरकारी अस्पताल परिसर के अंदर संचालित जन औषधि केंद्रों को बंद करने का निर्देश दिया गया था।
न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना ने राकेश महालिंगप्पा एल और अन्य की ओर से दायर याचिकाओं के एक बैच को अनुमति देते हुए मौखिक रूप से कहा, “हम सरकार के एक विंग को गरीबों को दी जाने वाली दवाओं के साथ छेड़छाड़ करने की अनुमति नहीं देंगे, चाहे वह मुफ्त हो या मामूली कीमत पर।”
विस्तृत आदेश अभी जारी किया जाना है।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि सरकारी आदेश जल्दबाजी में बिना किसी परामर्श के पारित किया गया था और इससे सार्वजनिक हित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। उन्होंने तर्क दिया कि ये केंद्र 50-90 फीसदी कम कीमतों पर जेनेरिक दवाएं प्रदान करते हैं, जिससे गरीबी रेखा से नीचे के नागरिकों, निश्चित आय वाले वरिष्ठ नागरिकों, दिहाड़ी मजदूरों और पुराने मरीजों के लिए दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित होती है। उन्होंने कहा कि सरकारी आदेश संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत आजीविका के अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन करता है, साथ ही नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है।
राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दावा करते हुए कि अस्पतालों के अंदर उनकी उपस्थिति अनावश्यक थी ,यह तर्क दिया कि अस्पतालों में पहले से ही मुफ्त दवाएं दी जा रही थीं और केंद्र अस्पताल परिसर के बाहर काम करना जारी रख सकते हैं,
